भूकंप के क्षेत्र में कार्य कर रहे सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद, भाभा चेयर प्रोफेसर डॉ. वीपी डिमरी ने हाल ही में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान में व्याख्यानमाला के दौरान बताया कि भुज और नेपाल में भूकंप आने के चार-पांच दिन पहले तापमान तीन से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।
इसके साथ ही भूकंप वाले क्षेत्र में भूगर्भ से हीलियम गैस का रिसाव बढ़ जाता है। इससे एक-दो दिन पहले भूकंप का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके अलावा अचानक जलस्तर घट या बढ़ जाता है। नालों से पानी अचानक गायब हो जाएगा या फिर बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
इसके अलावा प्राइमरी और सेकेंडरी तरंगें निकलती हैं। प्राइमरी तरंगें बहुत तेज जाती हैं। अगर इन्हें पहचान कर अलर्ट हो तो सेकेंडरी तरंगों के आने तक कुछ संभला जा सकता है। सेकेंडरी तरंगें ही तबाही मचाती हैं। इनके बीच 65-67 सेकेंड का गैप होता है। मैक्सिको में इन्हीं संकेतकों के समझ लेने से तबाही कम हुई।
कुछ सालों में आए बड़े भूकंप
शिलांग (1898 वर्ष), कांगड़ा (वर्ष1904), बिहार-नेपाल (वर्ष1934), असम (वर्ष 1950), भुज (वर्ष 2001), नेपाल (वर्ष 2015)
छोटे भूकंप टलता हादसा
छोटे-छोटे भूकंप से भूगर्भ की ऊर्जा निकलते रहने से बड़े भूकंप का खतरा आगे टलता रहता है। विज्ञानियों का कहना है कि छोटे भूकंप से भूगर्भ का दबाव थोड़ा कम हो जाता है, फिर भी अगर भूगर्भ में ऊर्जा भरी हुई है तो बड़े भूकंप की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।