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रामदेव ने मंत्रिमंडल से कटवाया उत्तराखंड का नाम

Wed, 12 Nov 2014 08:52 AM IST
गिरीश रंजन तिवारी/ अमर उजाला, नैनीताल
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उत्तराखंड से केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्थान पाने से अंतिम क्षणों में वंचित रहे अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा का नाम कट जाने के पीछे बाबा रामदेव का हाथ बताया जा रहा है।
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भाजपा के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि आठ नवंबर को दिल्ली आमंत्रित किए जाने के बावजूद टम्टा को बैरंग लौटा दिए जाने के पीछे बाबा रामदेव के हठयोग का ही रोल है।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार से पहले आठ नवंबर की शाम को अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा को पीएमओ से बुलावा आया था।

तथा उन्हें नौ नवंबर की सुबह साढ़े नौ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चाय पार्टी के लिए उपस्थित रहने को कहा गया था। इस पार्टी में उन्हीं सांसदों का आमंत्रित किया गया था जिन्हें मंत्री पद दिए जाने की तैयारी थी।
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निशंक को मंत्री बनाए जाने के पक्ष में थे रामदेव

टम्टा इसके लिए दिल्ली रवाना हो भी गए थे, लेकिन सूत्रों के अनुसार रात साढ़े बारह बजे उन्हें पीएमओ से दोबारा फोन आया, जिसमें चाय पार्टी में आने से मना कर दिया गया।

बताया जाता है कि हरिद्वार के सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को मंत्री बनाए जाने के पक्ष में थे। इसलिए उन्होंने टम्टा का पत्ता कटवा दिया। जानकारी के अनुसार टम्टा ऐसे अकेले सांसद नहीं है, जिन्हें बुलावे के बाद में रोक दिया गया।

उत्तर प्रदेश के भदोई से सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त, छत्तीसगढ़ के रायपुर से सांसद रमेश बैस तथा बिहार के बक्सर से सांसद अश्वनी चौबे को भी इसी प्रकार आमंत्रित करने के बाद अचानक रोक दिया गया।

राजनीति, गुटबाजी और बाबा रामदेव का हाथ

इनमें से छत्तीसगढ़ के सांसद रमेश बैस 1989 से आज तक लगातार सात बार भाजपा के टिकट पर सांसद रह चुकने के बावजूद आज तक मंत्री नहीं बन पाए हैं।

ये तीनों ही इस बार विभिन्न कारणों से मंत्री बनते बनते रह गए। इनमें उत्तराखंड के अजय टम्टा का नाम कटने के पीछे राज्य की स्थानीय राजनीति, गुटबाजी और बाबा रामदेव का हाथ बताया जा रहा है।

भाजपा के सूत्रों के मुताबिक बाबा रामदेव किसी भी सूरत में टम्टा को मंत्री पद दिए जाने के पक्ष में नहीं थे और उनके प्रयास के कारण ही अंतिम समय में उनका नाम संभावित मंत्रिमंडल से हटा दिया गया।

फोन आया और बदला निर्णय

उधर, संख्याबल बल कम होने के बावजूद भाजपा राज्यसभा के लिए कांग्रेस के खिलाफ प्रत्याशी उतारने पर आमादा रही। आनन फानन में भाजपा प्रदेश संगठन ने दर्जन भर विधायकों को प्रदेश कार्यालय बुला लिया ताकि पार्टी की तरफ से नरेश बंसल का नामांकन दाखिल हो सके।

सब इकट्ठे हुए और फोटो भी खिंचवाएं। लेकिन इसी पल प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू का फोन आया और चुनाव नहीं लड़ने के निर्णय से अवगत करा दिया गया। बस, फिर सब अपने गंतव्य को रवाना हो गए। नामांकन के आखिरी दिन भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के लिए नरेश बंसल का नाम फाइनल कर दिया।

सुबह से ही प्रदेश मुख्यालय पर गहमागहमी शुरू हो गई। प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के अलावा विधायक मदन कौशिक, हरबंश कपूर, अजय भट्ट, पुष्कर सिंह धामी, प्रेमचंद अग्रवाल, आदेश चौहान, दिलीप रावत, स्वामी यतीश्वरानंद व संजय गुप्ता आदि प्रदेश कार्यालय पर जमा हो गए।
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बैकफुट पर आ गई प्रदेश भाजपा

जैसे ही चलने की तैयारी हुई तो प्रदेश अध्यक्ष के फोन पर प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू ने केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय से अवगत कराते हुए पर्चा दाखिल करने से मना कर दिया। दरअसल, नंबर गेम की पिक्चर स्पष्ट होने के बावजूद चुनाव लड़ने का निर्णय लेने पर केंद्रीय नेतृत्व ने संख्याबल का गणित पूछा तो प्रदेश भाजपा बैकफुट पर आ गई।

भाजपा ने भी निभाई परंपरा
भाजपा के शासनकाल में जब तरुण विजय ने राज्यसभा के लिए पर्चा भरा तो कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। इससे पहले जब भगत सिंह कोश्यारी राज्यसभा गए तो कांग्रेस ने निर्दलीय तौर पर मनीष वर्मा को समर्थन तो किया लेकिन बाद में पीछे हट गई। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए कांग्रेस के खिलाफ भाजपा ने भी प्रत्याशी नहीं उतारा।

कांग्रेस की अंतर कलह के मद्देनजर जीत की पूरी गुंजाइश थी, लेकिन तोड़ फोड़ कर चुनाव जीतना व सत्ता हथियाना भाजपा के स्वभाव में नहीं है। कांग्रेस ने एक महिला को प्रत्याशी बनाया तो भाजपा ने भी महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए अपना निर्णय बदल लिया।
- तीरथ सिंह रावत, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
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