उत्तराखंड के एक आयोग के सदस्य का इलाज दिल्ली के निजी अस्पताल में चल रहा है। लेकिन हर माह महंगी ब्रांडेड दवाएं उनके घर दून अस्पताल से मुफ्त जाती हैं।
इसके लिए दून अस्पताल में इलाज का फर्जी पर्चा बनवाया जाता है। फिर डॉक्टर उनकी जरूरत के अनुसार पर्चे पर दवाएं लिख देता है।
इसके बाद अस्पताल प्रशासन इन दवाओं को खरीद कर उन्हें उपलब्ध करा देता है।
मुफ्त में दून अस्पताल से मिलती है महंगी दवाएं
सचिवालय में प्रमुख सचिव स्तर के एक अधिकारी को इसी तरह मुफ्त की सुविधा मिल रही है। उनका इलाज दिल्ली में चल रहा है, लेकिन महंगी दवाएं मुफ्त में जाती हैं दून अस्पताल से।
दून अस्पताल में बाजार से दवाएं खरीदने की इस प्रक्रिया को लोकल पर्चेज (एलपी) के नाम से जाना जाता है।
इस सुविधा के तहत दवा हासिल करने के लिए शर्त यह है कि मरीज का इलाज दून अस्पताल में चल रहा हो। लेकिन, डॉक्टरों की मिलीभगत से नेता और अधिकारी इस सुविधा का बेजा फायदा उठा रहे हैं।
जेनेरिक से दूरी, ब्रांडेड से मोह
सरकारी डॉक्टर फर्जी पर्चा बना देते हैं और उन्हें महंगी दवाएं मुफ्त मिल जाती हैं। इस फर्जीवाड़े में शामिल नेताओं और अधिकारियों की लिस्ट बहुत लंबी है।
आम लोगों को सस्ती जेनेरिक दवाओं का फायदा गिनाने वाले अधिकारी और नेता अपनी सेहत का सवाल आने पर सिर्फ ब्रांडेड दवाओं पर भरोसा करते हैं।
यही कारण है कि लोकल पर्चेज के तहत कोई भी जेनेरिक दवा की मांग नहीं करता।
मुफ्त की महंगी दवाओं से अपनी सेहत सुधारने वालों में ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जो मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखने पर डॉक्टरों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी देते हैं।
सूत्र बताते हैं कि नेताओं और अधिकारियों की इस सुविधा पर सालाना करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं।
इनका क्या कहना है...
ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के असर में अंतर होता है। ब्रांडेड दवाएं अधिक प्रभावशाली होती हैं। दोनों तरह की दवाओं के असर में बीस फीसदी का अंतर होता है।
- डॉ. किशोर ठाकुर, डॉक्टर ऑफ मेडिसन, महंत इंद्रेश अस्पताल
शासन से अनुमन्य मरीजों को ही अस्पताल से एलपी पर दवा उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए दून अस्पताल का पर्चा होना जरूरी है। शासन से जो बजट मिलता है उसी से यह दवाएं खरीदी जाती हैं।
- डॉ. आरएस असवाल, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक दून अस्पताल