ऋषिकेश एम्स ने जटिल बीमारी से जूझ रही बच्ची को नई जिंदगी दी है। स्पिलिट कार्ड मलफार्मेशन (रीढ़ की हड्डी में पैदायशी बीमारी) से ग्रस्त दून निवासी तीन साल की बालिका का पेचीदा ऑपरेशन किया गया है।
संस्थान प्रशासन का दावा है कि एम्स की नई शाखाओं में स्थानीय इकाई की यह अपनी किस्म की बड़ी कामयाबी है।
बीते बृहस्पतिवार को संस्थान के निदेशक और न्यूरो सर्जन डॉ. राजकुमार ने देहरादून स्थित आईएमए कालोनी (ट्रे एंगल लाइन) निवासी शांता कुमार की तीन वर्षीय बेटी पलक का ऑपरेशन किया।
पांच घंटे से अधिक समय तक चले ऑपरेशन के बाद बच्ची स्वस्थ है। डॉ. राजकुमार ने बताया कि यह पैदायशी स्पाइन कार्ड से संबंधित बीमारी है।
पैर काम करना बंद कर देते
इसमें स्पाइन की हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं। इसका ऑपरेशन बच्चे के जन्म के छह माह के भीतर हो जाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर इसका दुष्प्रभाव होने लगता है। रोगी के पैर कमजोर होने लगते हैं। एक पैर छोटा हो सकता है।
पैरों के लकवाग्रस्त होने, पाखाने और पेशाब का कंट्रोल समाप्त होने का खतरा बना रहता है। डॉक्टर ने बताया कि पलक के केस में बच्ची की स्पाइन दो भागों में बंट गई थी।
इस बीमारी में शरीर के मूवमेंट से स्पाइनल कार्ड में चोट लगती है, जिससे खून की सप्लाई कम हो जाती है। इसके बाद पैर काम करना बंद कर देते हैं। बताया कि अब ऑपरेशन के बाद बच्ची के पैर पूरी तरह से काम कर रहे हैं।
दिल्ली एम्स के ढाई साल चक्कर लगाए
अगर ऋषिकेश एम्स में न्यूरो ऑपरेशन शुरू नहीं होते तो मेरी बच्ची ऑपरेशन के इंतजार में विकलांग हो जाती। दिल्ली एम्स में ऑपरेशन के लिए ढाई साल चक्कर लगाए। भूखे-प्यासे सड़कों पर कई रातें गुजारीं, लेकिन वहां ऑपरेशन नहीं हो पाया।
ऑपरेशन की डेट मिली लेकिन बेड नहीं मिल पाया। ऐसे में उम्मीद खत्म गई थी। लेकिन ऋषिकेश एम्स में ऑपरेशन शुरू होने की खबर ने संबल दिया। बच्ची को यहां दिखाया तो तकरीबन एक सप्ताह में उसे नई जिंदगी मिल गई।
रुंधे गले से पलक के पिता शांता कुमार कहते हैं कि यदि दिल्ली एम्स के भरोसे रहते तो मेरी बेटी का इलाज कभी नहीं हो पाता।
दिसंबर 2012 में पहली बार चेक कराया
बच्ची के पिता शांता कुमार ने बताया कि उन्होंने दिसंबर 2012 में पहली बार दिल्ली एम्स में बच्ची का चेकअप कराया।
वहां से ऑपरेशन के लिए अप्रैल 2013 की डेट मिली। मगर लंबी वेटिंग और बेड खाली नहीं होने की वजह से ऑपरेशन नहीं हो पाया। आईएमए की नौकरी करते हुए पूरे साल बच्ची को लेकर दिल्ली एम्स के चक्कर काटते रहे।
बीमारी से ग्रस्त बच्ची की परेशानी से परिवार विचलित हो गया था। कुछ दिन पहले समाचार पत्रों से जानकारी मिली कि ऋषिकेश एम्स में न्यूरो के ऑपरेशन शुरू हो गए हैं, लिहाजा बच्ची को चेकअप के लिए लेकर आए।
एम्स से केस स्टडी के तीन दिन बाद ही ऑपरेशन के लिए कॉल आ गई। एक सप्ताह बाद की डेट मिल गई। भगवान की कृपा से बच्ची का ऑपरेशन सफल रहा। अब उसे नया जीवन मिल गया है।