सिनेमा का बहुत गहरा प्रभाव समाज पर पड़ता है। इसलिए पैसा कमाने के लिए कुछ भी न परोसें। जिस तरह का कंटेंट खुलकर इस वक्त परोसा जा रहा है, वह हमारा व्यक्तित्व भी दर्शाता है। एंटरटेनमेंट की परिभाषा न बदलिए। जिन्हें साहित्य, शब्दों और भाषा की गूढ़ता का पता ही नहीं वह भी लेखक बने हुए हैं, फिल्में बना रहे हैं। इसलिए एक अभिनेता को सामाजिक जिम्मेदारी समझने और दर्शकों को भी अच्छे-बुरे सिनेमा की पहचान करनी होगी।
कई फिल्मों से लोगों के दिलों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी
अपनी खनकती आवाज के धनी अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने अमर उजाला से बातचीत में अभिनेताओं, लेखकों व फिल्मकारों का ध्यान सामाजिक जिम्मेदारी की प्रति खींचा। 90 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक चंद्रकांता में क्रूर सिंह का किरदार निभाने वाले अखिलेंद्र सिंह ने फिल्म लगान, दो दूनी चार, झलकी, अतिथि तुम कब जाओगे, गंगाजल, वीर जारा सहित कई फिल्मों से लोगों के दिलों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी।
उनके निभाए किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। अखिलेंद्र मिश्रा खुद को साहित्य और संस्कृति से जुड़ा हुआ व्यक्ति मानते हैं। यही वजह है कि विभिन्न मंचों से भी वह लोगों को अपनी संस्कृति, सभ्यता से जुड़े रहने का आह्वान करते है। इंडस्ट्री में अपनी लंबी यात्रा के दौरान सिनेमा में बदलते कंटेंट पर उन्होंने अपनी चिंता जाहिर की।
हरिद्वार रोड स्थित एक होटल में शनिवार को अमर उजाला से बातचीत में अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने कहा कि एक कलाकार सृजनकर्ता है, लेकिन अब जो सृजन हो रहा है वो विध्वंस कर रहा है। अभिनेता को अब अच्छे और बुरे सिनेमा की पहचान करना बहुत जरूरी है। साथ ही अभिभावकों को ही यह फर्क अपने बच्चों को समझाना होगा। हम जो देख रहे हैं, वही आचरण भी करेंगे। यह एक तरह से भोजन ही है, जो हम ले रहे हैं।
इसलिए हमें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। यह हमें ही सोचना है। खासतौर पर आज की पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है। मैं मानता हूं कि अभिनय आध्यात्मिक साधना है। इसलिए अभिनेता को भी यह समझना होगा कि किसका चुनाव उसे करना चाहिए।
डॉयलॉग में गालियों की जरूरत नहीं... कहकर ठुकरा दिया ऑफर
डॉयलॉग में गालियों की जरूरत नहीं....यह कहकर अखिलेंद्र मिश्रा ने ऑफर ठुकरा दिया था। उन्होंने बताया कि मुझे एक प्रोजेक्ट में काम करने का ऑफर मिला था। मुझे जो किरदार निभाने के लिए कहा जा रहा था, उसमें मेरे डॉयलॉग में गालियां देनी थीं। सुनकर ही मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैंने यह करने से मना कर दिया। मुझे नहीं लगता कि गालियों की दर्शक मांग करते हैं, लेकिन जबरदस्ती हम गलत चीजों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। मैं एक अभिनेता हूं और मेरी सामाजिक जिम्मेदारी है कि मैं इन चीजों को बढ़ावा न दूं और मैं ऐसे लोगों के साथ ही काम करना पसंद नहीं करता।
फिल्में बनाने के लिए विषयों की भरमार
अध्यापन से पहले अध्ययन जरूरी है और अध्ययन करेंगे तो हमारे देश में बहुत से विषय हैं, जिन्हें पर्दे पर दिखाया जा सकता है। अखिलेंद्र मिश्रा के अनुसार विषयों की कमी नहीं है, लेकिन चुनाव ही खराब होता जा रहा है।
यहां की खूबसूरती देखकर मन यहीं ठहर गया
देवभूमि में आकर खुद को आनंदित महसूस कर रहे अखिलेंद्र मिश्रा ने शिव तांडव की पंक्तियां सुनाकर बाबा केदारनाथ को प्रणाम किया। अखिलेंद्र बताते है कि मैं बार-बार कमरे से बाहर आकर, कभी खिड़की खोलकर यहां की खूबसूरती को देखता हूं। इतना साफ मौसम देखना मुंबई में नसीब नहीं। यहां की खूबसूरती देखकर मन यहीं ठहर गया है।