उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपना फोकस आपदा प्रबंधन को करार दिया है। ऐसे में सबकी नजर केदारधाम के पुर्ननिर्माण पर है।
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वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान आपदा के बाद केदारधाम के आस-पास मलबे को न हटाए जाने की संस्तुति कर चुका है। लेकिन इसके ठीक विपरीत भारतीय भू सर्वेक्षण यानी (जीएसआई) ने मलबे को हटाए जाने के साथ ही इसके लिए ग्रीन ब्लास्ट टेक्नोलॉजी की पैरवी की।
ग्रीन ब्लास्ट टेक्नोलॉजी की पैरवी
अब सवाल यह कि क्या इन दो विशेषज्ञ संस्थानों की इन विरोधाभासी संस्तुतियों के बीच मलबे का ट्रीटमेंट हो पाएगा?
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मलबे से छेड़छाड़ न किए जाने के पक्ष में वाडिया हिमालयन भू विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ डॉ. डीपी डोभाल का अपना मत है। उनकी मानें तो केदारधाम के पीछे बड़े बोल्डर हैं।
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आगे बेहद छोटे-छोटे टुकड़े हैं। यह अपने आप दब जाएंगे। ग्रीन ब्लास्ट टेक्नोलॉजी को वह उचित नहीं ठहराते।
छेड़छाड़ से खड़ी होगी मुश्किल
उनका सवाल है कि आपदा के बाद केदारधाम में एकत्र हुए मलबे को केमिकल का प्रयोग कर हटा भी दिया जाए तो उसे डंप कैसे किया जाएगा?
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क्या मंदाकिनी नदी में? उनकी मानें तो मलबा 50 हजार टन से भी अधिक है। ऐसे में उससे छेड़छाड़ मुश्किल खड़ी करेगी।
कुछ नहीं कह रहे जीएसआई के अधिकारी
उधर, मलबे से भविष्य के खतरे को देखते हुए जीएसआई मलबे को हटाने में ग्रीन ब्लास्टिंग टेक्नोलाजी की हिमायत बेशक कर चुकी है, हैरत इस बात की है कि जीएसआई के वरिष्ठ अधिकारी एसके त्रिपाठी इसे अपना फील्ड नहीं बताते।
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त्रिपाठी मलबे के संबंध में संस्थान की संस्तुति के संबंध में कुछ भी कहने से इंकार करते हैं। ऐसे में मलबे की ट्रीटमेंट की राह मुश्किल लगती है। केदारधाम यात्रा कराने के लिए कमर कस चुकी सरकार को इस पर भी फैसला लेना ही होगा।