कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के मामले में सोमवार को बागी विधायकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम और दिनेश द्विवेदी ने लगभग दो घंटे तक अपना पक्ष रखा। पैरवीकारों ने कहा कि जब राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था तब इन विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का आदेश आधारहीन है।
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इस मामले में हाईकोर्ट ने स्पीकर से पूछा है कि विधायकों की बर्खास्तगी 27 मार्च को ही क्यों की गई, जबकि 28 मार्च को फ्लोर टेस्ट होना था। यह भी सवाल किया कि सदन में वित्त विधेयक पारित हुआ या नहीं। इसके अलावा येदियुरप्पा से संबंधित मामले में भी अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। कोर्ट के इन सवालों का जवाब मंगलवार को स्पीकर की ओर से पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल देंगे।
न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकलपीठ में सुनवाई के दौरान बागी विधायकों (याचिकाकर्ता) की ओर से दलील दी गई कि 18 मार्च को वित्त विधेयक के खिलाफ उन्होंने सदन में मत विभाजन की मांग की थी, इसका आशय यह नहीं है कि वे पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले गए हैं।
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कोर्ट ने पूछा, सदन में वित्त विधेयक पारित हुआ या नहीं
नैनीताल हाईकोर्ट
- फोटो : PTI
स्पीकर की ओर से यह कहा जाना कि उन्हें 19 मार्च को कारण बताओ नोटिस दे दिया गया तथा 22 मार्च को उनके पतों पर नोटिस व अन्य आरोप चस्पा कर दिए गए, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।
26 मार्च को जब उन्होंने स्पीकर से आरोपों की प्रतिलिपि मांगी तो स्पीकर की ओर से कहा गया कि आरोपों की प्रति उन्हें विगत 25 मार्च को दे दी गई थी तथा विधानसभा में स्पीकर की ओर से बताया गया था कि अंतिम सुनवाई 27 मार्च को सुबह 9 बजे होगी, लेकिन उस दिन उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया।
याचियों ने कोर्ट को बताया कि स्पीकर ने इस संबंध में विभिन्न समाचार चैनलों में वक्तव्य दिए हैं, जिनकी वीडियो फुटेज कोर्ट में पेश की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था तो उसके बाद सदस्यता समाप्त करने का आदेश ही आधारहीन है।
उन्होंने कहा कि विधायक जो विभाजन की मांग कर रहे थे, जिसे स्पीकर ने भी स्वीकार किया है। ऐसे में उनकी बर्खास्तगी नहीं की जा सकती है। जब ध्वनिमत हुआ है तो बागी विधायकों के पार्टी छोड़ने का सवाल ही नहीं होता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि कांग्रेस पार्टी खुद कह रही है कि वे कांग्रेसी हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें आज तक कोई नोटिस जारी नहीं किया।
विधायकों ने येदियुरप्पा मामले का दिया उदाहरण
र्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा बागियों में प्रमुख हैं।
- फोटो : file photo
उन्होंने विधायकों के बहुमत हिस्से के मत विभाजन की मांग को पार्टी छोड़ने जैसा कोई कदम नहीं बताया। साथ में कहा कि स्पीकर ने इसको नजर अंदाज किया है कि बागी विधायकों ने सीएम हरीश रावत के निष्कासन की नहीं, बल्कि उन्हें बर्खास्त करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से कर्नाटक हाईकोर्ट के मामले का उदाहरण देते हुए कहा था कि वहां सात कैबिनेट मंत्री के साथ कई विधायकों ने न्यायालय से कहा था कि येदियुरप्पा सरकार ने लोगों का विश्वास खो दिया है। उन्होंने कहा कि किसी गलत बात के खिलाफ खड़ा होना अगर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएगी तो ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि कोई मंत्री पद से त्याग करते हैं तो वह दल बदल कानून के तहत नहीं आते हैं। हरीश रावत की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई थी न कि कांग्रेस के खिलाफ कोई भी गलत शब्द कहा था। 19 मार्च को जेट से दिल्ली जाने के मामले में उनकी ओर से कहा गया था कि वो दिल्ली कांग्रेस के मुख्यालय जा रहे थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल स्पीकर की पैरवी कर रहे हैं।
- फोटो : अमर उजाला
न्यायालय में याचिकाकर्ताओं की ओर से पूर्व महाधिवक्ता यूके उनियाल, साकेत बहुगुणा तथा विकास बहुगुणा भी पैरवी के दौरान मौजूद रहे।
कोर्ट ने विभिन्न बिंदुओं पर मंगलवार को स्पीकर की ओर से पक्ष रखने के लिए कपिल सिब्बल को अनुमति दी है। बता दें कि हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बागी विधायक सुबोध उनियाल, शैला रानी रावत, उमेश शर्मा काऊ, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, हरक सिंह रावत, अमृता रावत, शैलेंद्र मोहन सिंघल व प्रदीप बत्रा ने 27 मार्च को स्पीकर की ओर से उनकी सदस्यता को समाप्त करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कहा था कि उन्होंने पार्टी की खिलाफत नहीं की थी, वे केवल मुख्यमंत्री का विरोध कर रहे थे।