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हरीश रावत के 'एक्शन' ने हिला दी भाजपा की जमीन

Sat, 26 Jul 2014 12:02 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने प्रदेश कांग्रेस में नई जान फूंक दी है। नतीजों ने प्रदेश सरकार को मजबूत अंकगणित देने के साथ विपक्ष में बैठी भाजपा की राजनीतिक जमीन को हिला दिया है।
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लोकसभा चुनाव में जिस धारचूला विधानसभा पर भाजपा अपना परचम नहीं लहरा पाई थी उस किले को मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने अभेद बना दिया। वहीं जिस डोईवाला सीट की पहचान प्रदेश में भाजपा के दुर्ग के रूप में होती थी वहां अब कांग्रेस का झंडा लहरा रहा है।

धारचूला में भाजपा अपनी हार मानकर चल रही है पर उसकी दोनों सीटें सोमेश्वर और डोईवाला इतनी आसानी से हाथ से निकल जाएंगी यह भाजपा नेताओं ने नहीं सोचा होगा जबकि कांग्रेस इस चुनाव को इस रणनीति से लड़ रही थी कि भाजपा से कम से कम एक सीट छीननी है।
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बिस्तर पर पड़े सीएम ने बनाया दमदार प्लान

एम्स के बिस्तर पर पड़े मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस दिन रेखा आर्य को भाजपा से खींचकर कांग्रेस में शामिल कर उम्मीदवार बनाया, तभी स्पष्ट हो गया था कि यह सीट कांग्रेस के खाते में गई। अल्मोड़ा संसदीय सीट से जुड़ी दोनों विधानसभाओं पर हरीश रावत की पुराने रिश्ते और मेहनत भी काम आई।

कांग्रेस ने उम्मीदवारों की भाजपा से पहले एक साथ घोषणा, एक ही दिन एक साथ नामांकन और मंत्रियों को पर्यवेक्षक की भूमिका में उतारकर मजबूत चुनावी तानाबाना बुना था।

धारचूला में यशपाल आर्य और अल्मोड़ा में इंदिरा हृदयेश के साथ डोईवाला में सुरेन्द्र सिंह नेगी के अतरिक्त हरक सिंह रावत और दिनेश अग्रवाल को भी मैदान में उतारा था।

कांग्रेस अंदरखाने डोईवाला को अपना नहीं मान रही थी बावजूद पूरी ताकत लगा दी थी। डोईवाला में मजबूत किलेबंदी के बावजूद आखिरी समय तक पार्टी में एकता की गाड़ी रफ्तार नहीं पकड़ रही थी।

डोईवाला में कांग्रेस ने पढ़ा एकता का मंत्र

चुनाव के अंतिम चरण में डोईवाला में बिगड़े गुटीय समीकरण को सुधारने का काम इंदिरा हृदयेश ने किया। इंदिरा हृदयेश ने सभी गुटों के बीच तालमेल बैठा चुनावी प्रबंधन का भी जिम्मा संभाला। इंदिरा की रणनीति काम कर गई और मतदान से पहले पूरी कांग्रेस हीरा सिंह बिष्ट के साथ खड़ी दिखी।

मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी धारचूला सीट पर भले नहीं गए लेकिन एम्स से लौटने पर पहले डोईवाला में रोडशो कर देहरादून में घुसे। डोईवाला को लेकर सवाल उठ रहे थे कि हीरा सिंह बिष्ट चूंकि मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ टिकट लाए इसलिए उन्हें नुकसान हो सकता है।

विरोधियों के इस प्रचार पर अंकुश लगाने के लिए ही मुख्यमंत्री की टीम खुलकर चुनाव मैदान में उतरी। जबकि भाजपा में इसका ठीक उलट होने से डोईवाला पर कब्जा हो गया।
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करीब तीस साल लग कांग्रेस को

डोईवाला का किला फतह करने में कांग्रेस को करीब 30 साल लग गए। राज्य बनने के बाद कांग्रेस यहां कभी नहीं जीती। 1985 में कांग्रेस के किशोरी लाल सकलानी यहां से आखिरी कांग्रेस विधायक थे।

1989 का चुनाव निर्दलीय ने जीता जबकि 1991 फिर 1993 और 1996 में यहां से भाजपा के राजेन्द्र शाह चुनाव जीते। 2002 और 2007 में त्रिवेंद्र सिंह यहां से विधायक हुए। 2012 में सांसद रमेश पोखरियाल निशंक यहां से लड़े और जीते।
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