पूरे देश में भले ही कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा हो और कई राज्य उसके हाथ से निकल गए हैं लेकिन उत्तराखंड में मोदी लहर को फीका कर उसने खुद को मजबूत किया है।
2012 विधानसभा चुनाव में 32 सीट जीतकर आने वाली कांग्रेस ने तीन सालों में चार सीटें बढ़ाकर पूर्ण बहुमत (36) की सरकार बना ली है। तीन सालों में कांग्रेस ने भाजपा से तीन विधानसभा सीट छीनी हैं। चौथी भगवानपुर विधानसभा सीट पहले से कांग्रेस समर्थित थी लेकिन इस बार अपना उम्मीदवार उतारने से ये सीधे तौर पर कांग्रेस के खाते में आ गई है।
कांग्रेस ने 2012 में भाजपा को पहला झटका सितारगंज विधानसभा के तौर पर दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भाजपा विधायक रहे किरण मंडल को इस्तीफा दिलाकर अपने लिए सीट खाली कराई और जीती। लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों सीटें गवां देने वाली कांग्रेस ने उसके तुरंत बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में भी भाजपा की दो सीटें छीनीं।
रमेश पोखरियाल निशंक और अजट टम्टा के सांसद चुने जाने के बाद भाजपा के दुर्ग डोईवाला में कब्जा और सोमेश्वर में भाजपा की रेखा आर्य को अपने पक्ष में कर कांग्रेस ने वहां भी मैदान मार लिया। इस दौरान मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी कांग्रेस विधायक हरीश धामी के धारचूला सीट खाली करने पर वहां से जीत दर्ज कराई।
भाजपा से आसानी से छीनी सीट
उत्तराखंड में कांग्रेस की जीत का एक कारण संगठित होकर योजनाबद्ध तरीके से आक्रामकता के साथ चुनाव में उतरना रहा है। भाजपा की तरह कांग्रेस में भी गुटबाजी चरम पर है लेकिन पार्टी जीत को लेकर एकजुट दिखी। बहुगुणा तमाम विधायकों की नाराजगी के बाद सीएम बनाए गए लेकिन भाजपा से आसानी से सीट छीन ली।
डोईवाला में हीरा सिंह बिष्ट मुख्यमंत्री की नापसंद बताए गए लेकिन रावत एम्स से छूटने के बाद पहले उनके क्षेत्र में पहुंचे। डोईवाला कांग्रेस ने कभी नहीं जीती थी लेकिन वहां भी पार्टी जीत को लेकर एकजुट दिखी। सोमेश्वर में सीएम ने अंतिम समय में भाजपा से लाकर उम्मीदवार उतार दिया। फैसले पर पार्टी में विरोध तो हुआ लेकिन उम्मीदवार को जिताने में पार्टी ने कसर नहीं छोड़ी।
लोकसभा चुनाव के ठीक बाद जमीनी स्तर पर यानि पंचायतों के चुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ाई। मंत्री हरक सिंह रावत, प्रीतम सिंह ने जिन उम्मीदवारों का समर्थन किया पार्टी साथ खड़ी हुई। भगवानपुर में भी पार्टी एकजुटता और आक्रामकता जीत का बड़ा कारण रही।
ममता राकेश की उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस में मास्टर सत्यपाल खुलकर विरोध में आए लेकिन पार्टी ने अंतिम समय में मैनेज कर लिया। पार्टी जीत को लेकर भी अति आत्मविश्वास में नहीं दिखी। भगवानपुर की जीत का एक कारण कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं मुस्लिम-दलित का संयोजन भी रहा। बसपा के मैदान छोड़ने से कांग्रेस सहानुभूति के साथ अपने परंपरागत मतदाताओं को भी खींच सकी।
वक्त लगेगा भगवानपुर की हार पचाने
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
मुकाम वो चाहिए कि जिस दिन भी हारूं, जीतने वाले से ज्यादा चर्चे हो मेरी हार के। यदि इस पंक्ति पर भाजपा ने थोड़ा बहुत सबक लिया होता तो भगवानपुर के चुनावी रण में इतनी दुर्गति ना होती। ठोस रणनीति के अभाव के बावजूद उन लोगों की बात को अनसुना किया गया जो पार्टी प्रत्याशी को शुरूआती दौर से ही कमजोर करार दे रहे थे।
चुनाव तो हारे लेकिन वोट बढ़े, इस जुमले को सुना सुनाकर भाजपाई अपनी कमियों को ढकने की निरर्थक कोशिश कर रहे है।
प्रदेश में भाजपा की डोईवाला और सोमेश्वर जो अपनी सीटें उन पर तो लुटिया डूबी ही, भगवानपुर के रण में भी एक अंक बढ़ाने का मौका भी खो दिया।
जिस दिन भाजपा ने प्रत्याशी घोषित किया उसी दिन पार्टी के भीतर कमजोर प्रत्याशी चयन की सुगबुगाहट होने लगी थी। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने पार्टी के अंदर जमीनी हकीकत की इस तपिश को महसूस नहीं किया। इसके बाद भाजपाइयों ने प्रत्याशी के लिए जमीन पर कम और कांग्रेस के खिलाफ अखबारों में छपने छपाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च की।
शुरू में ही दिखने लगा था कि चुनाव एकतरफा जा रहा है। भाजपा नेता अपने प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में भी मेहमानों की तरह गए और आए। भाजपा नेता काफिला बनाकर घूमते रहे लेकिन गांव में रहने वाली जनता की नब्ज को टटोलने का प्रयास नहीं किया। जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।
अब बात आती है जिम्मेदारी की। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते तीरथ सिंह रावत, क्षेत्रीय सांसद होने के नाते रमेश पोखरियाल निशंक और प्रदेश के दिग्गजों में शुमार और हरिद्वार में व्यापक प्रभाव रखने वाले विधायक मदन कौशिक से कार्यकर्ता देर सबेर इस हार का हिसाब जरूर मांगेगे।
कांग्रेस ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया। धन बल पूरी तरह झोक दिया गया। पिछली बार बसपा व कांग्रेस दोनों को जितने वोट मिले थे उतने ही वोट इस बार कांग्रेस को इसलिए मिले क्योंकि इस उप-चुनाव में बसपा का प्रत्याशी नहीं था। लेकिन पिछली बार भाजपा को दस हजार वोट मिले और इस बार 22 हजार से ज्यादा। इसलिए कांग्रेस बहुत खुशफहमी ना पाले।
- रमेश पोखरियाल (निशंक), हरिद्वार सांसद