हरीश रावत सरकार ने भगवानपुर की जीत के बाद पूर्ण बहुमत पा लिया है। अब मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरेंद्र राकेश के निधन से खाली हुई मंत्रिमंडल की जगह को भरना है। मंत्री पद पाने के लिए आधा दर्जन वरिष्ठ विधायक लंबे समय से ताल ठोंक रहे हैं।
वहीं ममता राकेश की रिकॉर्ड जीत के बाद एक खेमा उन्हें ही मंत्री बनाने के लिए पैरवी में उतरा है। तर्क दिया जा रहा है कि मंत्रिमंडल में कोई दलित महिला नहीं है।
पूर्ण बहुमत पाने के बाद मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि पीडीएफ को साथ लेकर ही चलते रहेंगे। ऐसे में पीडीएफ मंत्रियों को हटाने या कम करने की मांग करने वालों की निगाह एक मात्र खाली सीट पर है। मंत्री बनने के लिए जितने मुंह उतने तर्क हैं। बहुगुणा खेमे से सुबोध उनियाल का नाम लंबे समय से चलाया जा रहा है लेकिन नवप्रभात का मंत्री रहने का तजुर्बा समीकरण बिगाड़ रहा है।
हीरा सिंह बिष्ट अनुभव की दुहाई देकर उम्मीदवार हैं। शैलेंद्र मोहन सिंघल कुमाऊं को कुछ नहीं मिलने की बात पर डटे हैं। इस पर गढ़वाल के उम्मीदवारों का तर्क है कि मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, वित्त मंत्री और राजस्व मंत्री वहीं से हैं।
मदन विष्ट और राजेंद्र भंडारी वरिष्ठता के आधार पर दावेदारों में शामिल हैं। एक समय मजबूत दावेदार मयूख महर मैदान में तो हैं लेकिन अपना राजनीतिक सीआर खराब कर लिया है।