चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड सरकार के सामने खासा संकट है।
एक तरफ यात्रियों की संख्या सीमित रखने का दबाव है तो दूसरी तरफ कोशिश यह भी है कि इस बार चार धाम यात्रा में अधिक से अधिक यात्री पहुंचे। परेशानी यह भी है कि चार धाम यात्रा मार्ग पर अधिक यात्रियों को संभालने के लिए पर्यात इंतजाम नही हैं।
मौसम की अनिश्चितता लगातार रहती है बरकरार
जून 2013 की आपदा के बाद से ही यह साफ होने लगा था कि प्रदेश सरकार को चार धाम यात्रियों की संख्या को किसी तरह से सीमित करना पड़ेगा। चारो धाम उच्च हिमालयी क्षेत्र में हैं और यहां मौसम की अनिश्चितता लगातार बनी रहती है।
पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी कहा जाता रहा है कि यात्रियों की संख्या कम होनी चाहिए। खुद सरकार ने बायोमेट्रिक पंजीकरण और केदारनाथ में एक समय में पांच सौ लोगों से ज्यादा न जाने देने की व्यवस्था कर इसकी शुरूआत की थी।
परेशानी यह है कि यात्रियों की संख्या कम होने पर हरिद्वार से लेकर केदारनाथ तक के व्यवसायियों का कारोबार प्रभावित होता है। ट्रेवल एजेंट से लेकर होटल व्यवसाय तक इस यात्रा से जुड़े हुए हैं। ऐसे में प्रदेश सरकार की कोशिश है कि इस बार यात्रा में अधिक से अधिक यात्री पहुंचे।
मुख्यमंत्री हरीश रावत इसके लिए राज्यों में रोड शो करने का ऐलान कर चुके हैं और मुंबई में उन्होंने रोड शो किया भी। इसके अलावा पर्यटन विभाग भी लगातार अपनी तरफ से सुरक्षित उत्तराखंड का संदेश देने की कोशिश कर रहा है।
जून 2013 की आपदा को एक साल बीत चुका है। पहली बार शुरू हुई शीतकालीन यात्रा में भी करीब 67 हजार यात्री उत्तरखंड पहुंचे। यह सब इस बात का भी संकेत हैं कि इस बार चार धाम यात्रा में यात्रियों की संख्या में खासा इजाफा हो सकता है।
वहीं चार धाम यात्रा के मुख्य पड़ाव चमोली, रुद्रप्रयाग अधिक यात्रियों की संख्या का बोझ उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाए हैं। सबसे अधिक समस्या रहने, खाने और ठहरने से जुड़े व्यवसाय की है।
जून 2013 की आपदा ने इस व्यवसाय की कमर तोड़ दी थी और अभी तक यह पटरी पर नहीं आ पाया है। जाहिर है कि इस समस्या का सामना यात्रियों को करना पड़ सकता है।