श्रद्धालुओं को महाभिषेक, रुद्राभिषेक, प्रात: कालीन पूजा, सायंकालीन आरती करवाने का विधान है, यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। इन पूजा के लिए निश्चित समयावधि और संख्या मंदिर समिति की ओर निर्धारित की जाती है। जो सामान्य रूप से रात्रि के 12 बजे से तीन बजे के बीज होती है।
जिससे सामान्य रूप से आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन में किसी भी प्रकार की कठिनाई उत्पन्न न हो। जो श्रद्धालु स्वेच्छा से पूजा-अर्चना करवाना चाहते हैं, उन्हें ही प्राथमिकता दी जाती है, जिसे मंदिर समिति के आचार्य व वेदपाठी करते हैं। विशेष पूजा के लिए श्रद्धालु एक सहयोग राशि मंदिर समिति को देते हैं।
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स्वैच्छिक पूजा के लिए श्रद्धालुओं की ओर से दी गई सहयोग राशि से भगवान के नित्य नियम भोग, पूजा, प्रसाद, पूजार्थ द्रव्य, भंडारा, चिकित्सा व्यवस्था, यात्री विश्राम गृह निर्माण, रखरखाव, संस्कृत महाविद्यालयों का संचालन, विद्यालयों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को निशुल्क शिक्षा, आवास, भोजन आदि की व्यवस्था एवं मंदिर समिति के पुजारी, अधिकारी, कर्मचारी, सेवाकारों को वेतन उपलब्ध कराया जाता है।