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रैणी आपदा : राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोलने की सिफारिश, आपदा पीड़ितों के लिए काउंसिलिंग सेंटर बनाने का सुझाव

Sun, 05 Jun 2022 05:30 PM IST
रेनू सकलानी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

पिछले साल सात फरवरी को चमोली जिले में आई रैणी आपदा के कारणों और उससे उपजे हालात का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की टीम ने अध्ययन किया। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ में करीब 80 लोग मारे गए थे, जबकि 124 लापता हो गए थे।
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आपदा के बाद रैणी गांव - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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प्राकृतिक आपदाओं के लिए सर्वाधिक संवेदनशील उत्तराखंड राज्य में एक राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोले जाने की सिफारिश की गई है। साथ ही यह सुझाव भी दिया गया है कि चमोली (जोशीमठ) में आपदा पीड़ितों मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव को कम करने के लिए एक काउंसिलिंग सेंटर भी खोला जाना चाहिए।

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ये सिफारिश राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की अध्ययन टीम ने की है। इस टीम ने पिछले साल सात फरवरी को चमोली जिले में आई रैणी आपदा के कारणों और उससे उपजे हालात का अध्ययन किया। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ में करीब 80 लोग मारे गए थे, जबकि 124 लापता हो गए थे।

इस आपदा से 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। एनडीएम ने भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीटयूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी व जशक्ति व खान मंत्रालय के साथ मिलकर यह अध्ययन कराया। रिपोर्ट में हिमालय क्षेत्र में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के लिए अध्ययन करने की सलाह दी गई है। ऊर्जा मंत्रालय से कहा गया है कि हिमालय में बहुत सी जल विद्युत परियोजनाएं पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील हैं।

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पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी

रिपोर्ट में कहा गया कि रैंणी आपदा की भयावहता की एक बड़ी वजह पूर्व चेतावनी प्रणाली का विकसित न होना और ऐसे हादसों का अनुमान लगा पाने की अक्षमता है। रिपोर्ट में पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित की सिफारिश की गई। कहा गया नदी के ऊपर जहां ग्लेशियर से पानी आ रहा है, वहां एक निगरानी व चेतावनी प्रणाली बनाई जाए जो 24 घंटे ऐसे नियंत्रण कक्ष से नियंत्रित हो। यह आठ-आठ घंटे की तीन पालियों में लगातार सक्रिय रहे। निगरानी करने परियोजना से ही नहीं जिला प्रशासन से भी जुड़े हों। यह ऐसी प्रणाली हो कि एक बटन दबाते ही सभी हितधारकों तक खतरे की सूचना प्रसारित हो जाए।

परियोजना में बचने के रास्ते होने चाहिए

जल विद्युत परियोजनाएं जिनमें सुरंगों को निर्माण हो रहा है, वहां मजदूरों के बाहर निकलने के रास्ते होने चाहिए। सुरंग को खाली कराने के भी अलग रास्ते होने चाहिए। निर्माण लगे मजदूरों को आपदा आने पर बचाने की बार-बार मॉक ड्रिल करानी चाहिए।

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संस्थान बनेगा तो बचाव की रणनीति भी बनेगा

रिपोर्ट में उत्तराखंड में राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोलने की सिफारिश की गई। कहा गया कि उत्तराखंड में इस संस्थान की जरूरत इसलिए है क्योंकि यह राज्य बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, हिमस्खलन व अन्य प्राकृतिक आपदाओं को लेकर बेहद संवेदनशील है। इन घटनाओं में जोखिम और नुकसान को कम करने के लिए संस्थान संभावित आपदाओं व उनके जोखिम की तकनीकी व वैज्ञानिक तरीके से पहचान कर सकता है। ऐसे अध्ययन के आधार पर बचाव की रणनीति बनाई जा सकती है।
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उपग्रहों से निगेहबानी बढ़ाई जाए

विशेषज्ञों ने रैंणी आपदा की वजह ग्लेशियरों के टूटने की मानी गई। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया कि नदियों के उद्गम स्थलों व ग्लेशियर क्षेत्रों  में उपग्रहों (सेटेलाइट) से निगरानी को बढ़ाया जाए। इसके लिए इसरो देश से बाहर दूसरी एजेंसियों का भी सहयोग ले सकता है। साथ ही ऊंचाई वाले स्थानों पर हाइड्रो मेट्रोलॉजिकल स्टेशन भी बनाए जाएं।

ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए संस्थान बने

रिपोर्ट में ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए सेंटर फॉर ग्लेशियल रिसर्च स्टडीज एंड मैनेजमेंट की स्थापना की जरूरत बताई गई। साथ ही कहा गया कि ग्लेशियोलॉजी व ग्लेशियर अध्ययन करने वाले अकादमिक व शोध संस्थान अलग-अलग होकर काम करने के बजाय एक दूसरे को आंकड़ों और अध्ययन को साझा करें और इसके दोहराव से बचें।
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