पूरे देश में जहां कार्तिक शुक्ल पक्ष की अमावस्या को दीवाली मनाने का प्रचलन है। वहीं, उत्तराखंड के सुदूर में बसे जौनसार बावर क्षेत्र के कई गांवों में आज भी कार्तिक शुल्क पक्ष की अमावस्या के ठीक एक माह दिवाली का जश्न मनाया जाता है। पांच दिन तक चलने वाली इस दीपावली का जश्न इस बार 25 नवंबर से शुरू होगा। जो 29 नवंबर तक चलेगा। पुरातन संस्कृति को संजोए इस त्योहार में आज भी आत्मीयता काफी हद तक कायम है। इस दिवाली में पटाखों का शोरशराबा और आतिशबाजी का धुआं नहीं होता। यह त्योहार पूरी तरह से इको फ्रेंडली ढंग से मनाया जाता है।
इस त्योहार में मेहमानों को विशेष व्यंजन चिउड़ा और मीठी रोटी गुड़ोई परोसी जाती है। इस दिवाली को क्षेत्र में कई जगहों पर बूढ़ दवैली, बूढ़ी दिआऊड़ी, दयाउली कहा जाता है। इस पारंपरिक आयोजन से जुड़ी किवदंतियां महाभारत व रामायण युग से जुड़ी बताई जाती हैं। इस दिवाली में हिस्सा लेने के लिए दूरदराज में बसे लोग भी अपने गांव में लौटते हैं।
ऐसे मनाई जाती है यह दीवाली
पांच दिन तक चलने वाली इस दीवाली के पहले दिन सुबह के समय नादरीदियावी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर छोटे बच्चे भिमल की लकड़ी लेकर होल्लारे जलाते हैं। जिसके बाद शाम के समय औंस पर्व मनाया जाता है। जिसमें बड़े बुजुर्ग भी होल्लारे लेकर नाचते हैं। गांव स्थित थारी (देव स्थान) की पूजा होती है। दूसरे दिन भिरुड़ी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर गांव स्याणा ठारी के ऊपर बैठकर अखरोट फेंकता है। जिसे देव प्रसाद माना जाता है। तीसरे और चौथे दिन साजे पर्व मनाया जाता है। जिसके घर-घर में दावतों का दौर चलता है। पांचवे दिन हरिण पर्व मनाया जाता है। जिसमें एक काठ का हाथी तैयार किया जाता है। जिसके ऊपर बैठक कर गांव स्याणा करतब दिखाता है।
एक माह बाद दिवाली मनाने के कई हैं तर्क
जौनसार बावर क्षेत्र में बूढ़ी दीपावली मनाने के कई तर्क हैं। हजारों साल से जौनसार बावर में दीपावाली के एक माह बाद दीपावली मनाई जा रही है। कुछ लोगों का कहना है कि लंका फतह करने के बाद जब राम अयोध्या वापस लौटे तो क्षेत्र के लोगों तक यह समाचार एक माह बाद पहुंच सका। जिस पर एक माह बाद यहां पर दीपावली का जश्न मनाया गया। कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में जौनसार बावर क्षेत्र सिरमौर राजा के अधीन था। उस समय राजा की पुत्री दीपावली के दिन मर गई थी। इसके चलते पूरे राज्य में एक माह का शोक मनाया गया था। उसके ठीक एक माह बाद लोगों ने उसी दिन दीपावली मनाई थी। कुछ लोगों का तक है कि दीपावली के समय क्षेत्र में फसलों की कटाई का काम पूरे जोर पर होता है। ऐसे में इस समय लोगों के पास त्योहार की तैयारी और उसे मनाने का समय नहीं मिल पाता। ऐसे में ठीक एक माह बाद फसल कटाई का काम पूरा होने के बाद क्षेत्र में दीपावली का पर्व मनाया जाता है।
बूढ़ी दीपावली का त्योहार जौनसार बावर की संस्कृति का प्रतीक है। हजारों साल से लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। युवाओं को आगे भी यह परंपरा जारी रखनी चाहिए।
टीकम सिंह चौहान निवासी पंजिया
क्षेत्र में मनाई जाने वाली दीपावली में आत्मीयता प्रदर्शित होती है। रोजगार की तलाश में शहरों में जा बसे लोग भी इस त्योहार में हिस्सा लेने के लिए गांव लौटते हैं।
आनंद सिंह राठौर पानुवा
बूढ़ी दीपावली की खासियत यह है कि इसमें पटाखों का शोर शराबा नहीं होता। आज भी क्षेत्र में ढोल-दमाऊ पर नाच कर जश्न मना इस त्योहार को मनाया जाता है।
नात्थू सिंह तोमर खमरोली
आज कुछ गांव में व्यस्तता के कारण लोग नई बूढ़ी दिवाली का रूख कर रहे हैं जबकि, बूढ़ी दीपावली की रंगत ही अलग है। लोगों को को अपने त्योहारों की ओर लौटना चाहिए।
लाल सिंह तोमर खमरोली
आनन्द सिंह राठौर।- फोटो : VIKAS NAGAR
नात्थु सिंह तोमर।- फोटो : VIKAS NAGAR
लाल सिंह तोमर।- फोटो : VIKAS NAGAR