उत्तराखंड में भाजपा के अच्छे दिनों की गाड़ी पटरी से उतर गई। लोकसभा की जीत के हैंगओवर ने उपचुनाव में बड़ा नुकसान करा दिया।
धारचूला में कांग्रेस को वॉक ओवर देने जैसी स्थिति पैदा कर दी तो सोमेश्वर व डोईवाला में पार्टी ने अपने ही पैर पर कल्हाड़ी मार ली।
रेखा आर्य को कांग्रेस में जाने दिया और त्रिवेंद्र के टिकट को लेकर अंत समय तमाशा होता रहा। मोदी लहर में जीते लोकसभास चुनाव के बाद भाजपाइयों को ऐसी गफ़लत हुई की अपनी ही पीठ ठोंकने लगे। लेकिन लोस चुनाव की खुशफहमी को तीन सीटों के उप-चुनाव ने दूर कर दिया।
भाजपा इम्तिहान में फेल
रणनीतिक और सांगठनिक तौर पर प्रदेश भाजपा इस इम्तिहान में फेल हो गई। धारचूला में सीएम हरीश रावत के सामने पूर्व ब्लॉक प्रमुख बीडी जोशी को उतारकर पार्टी अपने प्रत्याशी को भूल गई।
प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत एक बार गए। तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों व किसी केंद्रीय नेता के एजेंडे में धारचूला नहीं था।
इसलिए हर रोज रणनीतिक कड़िया कमजोर होती चली गई। ऋषिकेश में प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह की मौजूदगी में हुई बैठक में डोईवाला को लेकर शुरू हुई तकरार का असर बाद तक रहा।
निशंक केवल एक दिन आए
पूर्व सीएम निशंक इस सीट से रुचि भट्ट व पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी यहां से सौरभ थपलियाल को टिकट दिलाना चाहते थे।
तब स्थिति ज्यादा नाजुक हो गई जब धारचूला व सोमेश्वर के नाम घोषित कर डोईवाला में त्रिवेंद्र के नाम को लटका दिया गया।
बीसी खंडूड़ी तो पत्नी की बीमारी केचलते नहीं आ सके लेकिन निशंक केवल एक दिन आए और चले गए। उधर, पंचायत की राजनीति से जुड़ा एक बड़ा गुट पार्टी प्रत्याशी को हराने में लगा रहा। बस ये सब कारण त्रिवेंद्र की हार की इबारत लिख गए।
सांसदों की अहमियत को जनता ने नकारा
सोमेश्वर में भी भाजपा ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया। पहले रेखा आर्य को लोकसभा के टिकट के लिए उलझाए रखा, बाद में उप-चुनाव केलिए आश्वस्त कर दिया और फिर हाथ खड़े कर दिए।
विवश होकर रेखा कांग्रेस में चली गई। भाजपाई जानते थे कि रेखा दमदार प्रत्याशी है। क्योंकि पिछले विस चुनाव में बतौर निर्दलीय मात्र ढाई हजार वोटों से हारी थी।
यह सब जानते हुए भी रेखा आर्य को कांग्रेस में जाने दिया। उधर, अल्मोड़ा सांसद अजय टम्टा भी रेखा केखिलाफ थे और उन्होंने बहुत दिल से चुनाव में काम नहीं किया। वह अपने भाई को टिकट दिलाना चाहते थे।
प्रदेश में हुए उपचुनाव में प्रदेश संगठन तो पूरी तरह फेल साबित हुआ लेकिन जिन विधायकों के सांसद निर्वाचित होने से इन सीटों पर उपचुनाव हुआ उनकी अहमियत को भी जनता ने नकार दिया। वर्ना, डोईवाला सीट से लोस प्रत्याशी रमेश पोखरियाल निशंक को 20 हजार से ज्यादा मतों की लीड मिली थी और अजय टम्टा सोमेश्वर से छह हजार से भी ज्यादा मतों से जीते थे। लेकिन दो महीने में ही कहानी पलट गई।