तीन दिन पहले शनिवार को चौथी विधानसभा के अंतिम सत्र के दौरान स्मृति के तौर पर विधायकों की ग्रुप फोटो खिंचावाई गई। इस फोटो में उत्तराखंड के सबसे वरिष्ठ विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रहे कपूर दूसरी पंक्ति में खड़े दिखाई दे रहे हैं। जबकि कई कनिष्ठ विधायक अग्रिम पंक्ति में बैठे दिखाई दे रहे हैं। आज भले ही सोशल मीडिया पर उनके जाने के बाद इस फोटो ने लोगों का ध्यान खींचा और आलोचना की, लेकिन यह कपूर की सादगी ही थी, जो वह चुपचाप पीछे खड़े हो गए, जबकि उनका स्थान अग्रिम पंक्ति में होना चाहिए था।
...तब कपूर साहब स्कूटर से उतरकर साथ-साथ पैदल चलने लगे
देहरादून, हरबंस कपूर और जनकवि डॉ. अतुल शर्मा तीनों ऐसे नाम हैं, जो इस शहर की आत्मा से जुड़े हैं। अब जब कपूर चले गए तो डॉ. अतुल शर्मा ने उन्हें अपने शब्दों में कुछ यूं याद किया। बकौल डॉ. अतुल शर्मा हम सुभाष रोड के पास रहते थे। एक दिन कपूर साहब अचानक घर आए और मुझे किसी क्लब की कविगोष्ठी में आमंत्रित किया। मैं वहां गया, लेकिन देर हो गई थी। सभी अपनी गाड़ी से चले गए। मैं रात को पैदल घर की ओर चला। परेड ग्राउंड के पास कुछ दूूर गया ही था।
तभी पीछे से किसी स्कूटर के आने की आहट हुई। देखा तो वह हरबंस कपूर थे। बोले, आप हमारे मेहमान हैं। मैं आपको घर छोड़कर आऊंगा। मैं आश्चर्य में पड़ गया। उनकी कर्तव्य भावना को नमन करने लगा। मैंने दृढ़ता से मना कर दिया। कहा, मैं आराम से चला जाऊंगा। साधारण आदमी हूं, पैदल चलने का अभ्यास है। लेकिन वह नहीं माने। स्कूटर से उतरकर उसे खींचते हुए साथ पैदल चलने लगे। अंतत: मुझे स्कूटर पर बैठना पड़। फिर वह मुझे घर छोड़कर लौट गए। यह उनका अत्यंत आत्मीय व्यवहार था।
उनके विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए एक कार्यक्रम में मुझे अचानक जनगीत गाने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया। मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। मैंने असहमति व्यक्त की। लेकिन जब कपूर साहब ने अपना उद्बोधन शुरू किया तो अन्य बातों के साथ मेरे लिखे गीत की पंक्तियां भी सुना दी। बाद में मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए उनसे पूछा, आपको गीत कैसे याद है? तब उन्होंने जो जवाब दिया, वह शब्द मेरे लिए बड़ा सम्मान थे। उन्होंने कहा-आपके गीत तो जनगीत है। उन्हें याद करने की जरुरत नहीं है। वह तो सबके मन में बसे हैं। इसके बाद वक्त-बेवक्त हमेशा उनका सानिध्य मिलता रहा। मेरी मां का निधन हुआ तो बहुत से आत्मीय लोग एकत्रित हुए। आंसुओं से भरी आंखों के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखकर मां की निर्मम चिता के सम्मुख मेरे साथ खड़े रहे। ऐसे व्यक्ति को कोई भला कैसे भूल सकता है।