पद मिला तो गुमान नहीं, नहीं मिला तो मलाल नहीं
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद हरबंस कपूर भाजपा के सबसे वरिष्ठ विधायकों में से थे। पांच बार के विधायक रहे कपूर को तब मुख्यमंत्री के दावेदारों में गिना गया। लेकिन पार्टी ने नित्यानंद स्वामी को सत्ता की बागडोर सौंपी। लेकिन कपूर के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने पार्टी के फैसले को सिर माथे पर रखा। जब वह 1991-92 में कल्याण सिंह की सरकार में ग्राम्य विकास, श्रम, एवं सेवायोजन राज्यमंत्री रहे। यूपी सरकार में राज्यमंत्री होने का कपूर को कभी गुमान नहीं रहा। 2017 में जब पार्टी की सरकार बनीं तब भी मंत्री न बनाए जाने के लेकर कपूर के चेहरे पर कोई मलाल नहीं था।
85 में चुनाव लड़ा तो पार्टी के कोषाध्यक्ष थे
1985 में भाजपा ने हरबंस कपूर को चुनाव मैदान में उतारा उस वक्त वह महानगर भाजपा के कोषाध्यक्ष होते थे। कपूर कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट से चुनाव हार गए। लेकिन पांच साल उन्होंने जमकर मेहनत की और अगले चुनाव में उन्होंने बिष्ट को पराजित कर दिया।
सुबह कोई रूठा तो शाम को मनाने घर पहुंच जाते
कार्यकर्ताओं को खुद से जोड़े रखने की कपूर की गजब की खूबी थी। सुबह कोई कार्यकर्ता किसी वजह से रूठ जाता तो कपूर शाम को उसे मनाने घर पहुंच जाते। न कोई गिला न कोई शिकवा। कार्यकर्ताओं और क्षेत्रवासियों से उनका निरंतर संवाद आज की पीढ़ी के नेताओं के लिए एक प्रेरणा है।
निर्विवाद रहे, बेदाग रहे
हरबंस कपूर भाजपा के उन गिनती के नेताओं में से हैं जिनका नाम कभी किसी विवाद नहीं जुड़ा। उन्हें यूपी सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला। अंतरिम सरकार में भी वह मंत्री रहे। विधानसभा अध्यक्ष के पद पर भी रहे। लेकिन अपनी छवि को उन्होंने हमेशा बेदाग बनाए रखा।
देहरादून सीट से अजेय हरबंस कपूर
1989 में कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट को हराया
1991 में कांग्रेस के विनोद चंदोला को हराया
1993 में कांग्रेस के दिनेश अग्रवाल को हराया
1996 में फिर कांग्रेस के दिनेश अग्रवाल को हराया
2002 में कांग्रेस के संजय शर्मा को हराया
2007 में कांग्रेस के लाल चंद शर्मा को हराया
2012 में कांग्रेस के देवेंद्र सिंह सेठी को हराया
2017 में कांग्रेस के सूर्यकांत धस्माना को हराया