दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तराखंडी मूल के प्रवासियों के साथ इस बार नाइंसाफी की गई। वे इस बात को लेकर हैं नाराज है कि संख्या के आधार पर उन्हें पार्टी ने तरजीह नहीं दी।
इतना ही नहीं, ऐसे लोगों को टिकट दे दिया गया है जो सदस्यता अभियान में भी सक्रिय नहीं रहे। इस बार उत्तराखंड से ताल्लुकात रखने वाले को महज एक प्रत्याशी को टिकट मिला है।
दलों के सर्वे को अगर आधार मानें तो 70 विधानसभा में करीब 10 सीट ऐसी हैं, जहां उत्तराखंडी मतदाता खासा प्रभाव रखते हैं। उत्तराखंडी मूल के नेताओं का कहना है कि दिल्ली में 20-22 लाख मतदाता उत्तराखंड के हैं।
बुराड़ी करावल नगर, मुस्तफाबाद, पालम, द्वारका, पटपड़गंज, लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली और कस्तूरबा नगर विधानसभा में इनकी अच्छी तादाद है। लेकिन पार्टी ने सिर्फ करावल नगर से एक टिकट दी है।
बोले उत्तराखंडी, हर बार मिला धोखा
भाजपा ने उत्तराखंडी प्रवासियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया है। पिछले 35 वर्ष में यह पहली बार है कि मंडल, जिला व प्रदेश पदाधिकारियों से प्रत्याशियों के चयन में राय तक नहीं ली गई।
-जगदीश ममगाई, एमसीडी के पूर्व चेयरमैन व भाजपा नेता
सदस्यता अभियान में जिसने भाग लिया उसे पार्टी ने तरजीह नहीं दी। दिल्ली की एक दर्जन सीट पर उत्तराखंड के लोगों का प्रभाव है, लेकिन पार्टी हर बार दरकिनार करती है। जबकि न केवल उत्तराखंड बल्कि दिल्ली में रहने वाले उत्तराखंड के लोग भाजपा के लिए शुरू से समर्पित हैं।
-विजय ढोंढियाल, दिल्ली प्रदेश सह संयोजक, उत्तराखंड प्रकोष्ठ
उत्तराखंड समाज की अनदेखी हुई है। पहाड़ के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया गया है। पार्टी पद से इस्तीफा देता हूं।
-तारा चंद उपाध्याय, सोशल मीडिया प्रमुख, नवीन शाहदरा जिला