बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने दिसंबर, 12 में देहरादून जिले के सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया के एक डिफाल्टेड प्लाट और इमारत की नीलामी की।
आरपी सिंह के नाम दर्ज इस संपत्ति का रिजर्व प्राइस रखा गया पांच करोड़ 40 लाख रुपए। अर्नेस्ट मनी डिपाजिट पांच लाख 40 हजार रखा गया।
डिफाल्टर्स की संपत्ति की नीलामी में होता है खेल
यह संपत्ति इससे कुछ ही अधिक में नीलाम हुई, जबकि इस संपत्ति की मार्केट वैल्यू 10 करोड़ रुपए से भी अधिक थी...। बैंकों के डिफाल्टर्स की संपत्ति की नीलामी की यह प्रक्रिया नई नहीं।
लेकिन सूत्र बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में कई जगह खेल होता है। बड़े कारोबारी, निवेशक बैंक वालों से सेटिंग कर खेल करते हैं, वह भी पूरे नियम-कायदों के साथ। नीलामी की सूचना बेहद गुप-चुप तरीके से दी जाती है।
इससे नीलामी में बेहद कम लोग शिरकत कर पाते हैं। कई जगह नीलामी करने वाले एक ही ‘गैंग’ के लोग होते हैं। इन्हीं के बीच सबसे ज्यादा बोली लगती है और संपत्ति नीलाम हो जाती है।
इससे नीलामी के जरिए सस्ती संपत्ति हासिल करने की आस बांधे लोग बस ताकने को मजबूर हैं। जबकि सच यह है कि यह संपत्ति आम आदमी के लिए इसलिए फायदेमंद हो सकती है, क्यांकि यह सरकारी निर्देशित मूल्य केआधार पर होती है।
ऐसे में मार्केट रेट से तकरीबन 30 फीसदी कम दर पर लोगों को प्रापर्टी हासिल हो सकती है, लेकिन सच यह है कि इस नियम का फायदा कमीशनखोरी के लिए उठाया जा रहा है।
यह है बोली की प्रक्रिया
- बैंक संपत्ति का एक रिजर्व प्राइस (न्यूनतम नीलामी मूल्य) रखता है।
- नीलामी में हिस्सा लेने वालों को अर्नेस्ट मनी डिपाजिट करना पड़ता है। यह रिफंडेबल है।
- नीलामी के बाद जिसके नाम बोली खुलती है उस व्यक्ति को उसी दिन 25 फीसदी राशि जमा करनी होती है।
- बची हुई राशि जमा करने केलिए उसकेपास 15 दिन का वक्त होता है।
बैंक झाड़ता है जिम्मेदारी से पल्ला
बैंक नीलामी के जरिए संपत्ति ‘जो है, जैसी है और जैसी है, जहां है’ केआधार पर बेचता है। ऐसी स्थिति में वह प्रापर्टी के टाइटिल की गारंटी नहीं लेता।
किसी भी तरह के कानूनी पेंच की स्थिति में जिम्मेदारी ग्राहक की बनती है। ऐसे में खरीदार को संपत्ति धारक से भी कंफरमेशन लेना जरूरी है।