उत्तराखंड के देवीधुरा में मां बाराही धाम के ऐतिहासिक खोलीखांड दूबाचौड़ा मैदान में हुई बग्वाल 14 मिनट तक चली। हजारों लोगों ने टकटकी लगाकर बग्वाल युद्ध का नजारा देखा।
बग्वाल में करीब 400 लोग शामिल हुए, जिसमें से 150 से अधिक बग्वाली वीर चोटिल हुए। घायल होने वाले बग्वाली वीरों की ये संख्या सबसे ज्यादा है। 2002 में 92 बग्वाली वीर घायल हुए थे।
दर्शक दीर्घा में बैठे 30 लोग पत्थरों की चपेट में आए। बग्वाल के इतिहास में पहली बार शंखनाद के बिना बग्वाल शुरू हुई। सबसे पहले वालिक खाम के बग्वाली वीरों ने रणक्षेत्र में प्रवेश किया।
फल के बाद पत्थरों की मार
उसके बाद चम्याल खाम, फिर लमगड़िया खाम और आखिर उत्तर दिशा से गहड़वाल खाम के बग्वाली वीर मां वज्र बाराही का जयकारा करते हुए आए।
मां व्रज बाराही के मंदिर की परिक्रमा करने के साथ ही चारों खामों के वीरों ने मोर्चा संभाला। इस बार शंखनाद के बिना ही चम्याल खाम की ओर से पहले फल तथा उसके बाद पत्थरों की मार शुरू हो गई।
लमगड़िया खाम का नेतृत्व वीरेंद्र लमगड़िया, चम्याल खाम का गंगा सिंह चम्याल, गहड़वाल खाम का वयोवृद्ध त्रिलोक सिंह बिष्ट और वालिक खाम का नेतृत्व बद्री सिंह बिष्ट ने किया।
चंवर झुलाकर बग्वाल युद्घ किया समाप्त
मंदिर के पीत वस्त्रधारी पुजारी धर्मानंद ने रणक्षेत्र में पहुंचकर चंवर झुलाकर बग्वाल समाप्त होने का संकेत किया। उनके इस संकेत के बाद बग्वाल रोक दी गई।
दोनों पक्षों के लोग एक दूसरे के गले मिले, उनकी कुशल क्षेम पूछी। सकुशल वापसी के लिए मां के दरबार में शीष नवाजा। इस बार बग्वाल 14 मिनट तक खेली गई।
बग्वाल खेलने का ये समय पिछले साल से एक मिनट अधिक है। पिछले साल 13 मिनट बाद बग्वाल रोक दी गई थी। परंपरा के मुताबिक बग्वाल पुजारी के द्वारा शंखनाद से शुरू होती है और चंवर झुलाकर संकेत करने के बाद बंद होती है।
दर्शकों से भरी रही सभी मकानों की छतें
बग्वाल का आंखों देखा हाल पीठाचार्य कीर्ति शास्त्री और संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य बीसी जोशी ने सुनाया। खोलीखांड दूबाचौड़ के आसपास के सभी मकानों की छतें दर्शकों से भरी हुई थी।
मंदिर कमेटी के मुख्य संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया के अनुसार इस दफा कम से कम पौने दो लाख से अधिक लोग बग्वाल के साक्षी बने। मां बाराही मंदिर के पूर्वी ढाल में गेट के पास भगदड़ मच गई।
भगदड़ में कोई चोटिल तो नहीं हुआ, लेकिन पुलिस को इसे काबू करने में भारी मुश्किल हुई। पुलिस निरीक्षक नरेश चंद के नेतृत्व में इसे तगड़ी मशक्कत के बाद नियंत्रित किया जा सका।
लोक परंपरा के अनुसार पाषाण युद्ध में भाग लेने वाले रण बांकुरों को अपना आहार व्यवहार शुद्ध रखना पड़ता है। घर से रण क्षेत्र की ओर रवाना होने पर परिवार के लोगों द्वारा अक्षत पूजन किया गया।