आईआईटी वैज्ञानिक ने उत्तराखंड की मिट्टी में ही पैदा होने वाला एक ऐसा बैक्टीरिया खोज निकाला है जो कीटनाशकों का काल बनेगा।
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इसे पंतनगर (उत्तराखंड) की मिट्टी से पृथक किया गया है। इसकी खासियत है कि यह एकसाथ तीन वर्गों के कीटनाशकों का खात्मा करने में सक्षम है।
यह बैक्टीरिया फसलों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान मिट्टी में रह जाने वाले कीटनाशकों को 15 घंटे के भीतर समाप्त करना शुरू कर देता है। 15 दिनों में इसका असर पूरी तरह खत्म कर देता है।
यह है शोध प्रोजेक्ट
आईआईटी के बायोटेक डिपार्टमेंट की वैज्ञानिक डॉ. रंजना पठानिया को उत्तराखंड काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (यूकोस्ट) की ओर से कीटनाशकों के खत्म करने वाले बैक्टीरिया पर शोध का प्रोजेक्ट दिया गया था।
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इसके बाद उन्होंने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डिजास्टर मिटीगेशन एंड मैनेजमेंट की प्रयोगशाला में इस आरपीटी-52 नामक बैक्टीरिया को विकसित किया।
बैक्टीरिया अलग करने में कामयाबी
आईआईटी के वैज्ञानिक ने सूक्ष्म विधि से (माइक्रोआर्गेनिज्म प्रोसेस) आरपीटी-52 नामक बैक्टीरिया पृथक किया है, जो ओर्गेनोक्लोरो, नियोनिकोटिनोइड एवं एंथ्रनेलिक डायअमाइड ग्रुप के एंडोसल्फान, इमीडाक्लोप्रिड एवं कोरेजन (सभी प्रचलित कीटनाशक) को खत्म करने में सफल रहा।
डीएनए चेंज से छह कीटनाशकों का खात्मा संभव
बैक्टीरिया के डीएनए में परिवर्तन करने के साथ ही विभिन्न कीटनाशकों की मौजूदगी में विकसित किया जा रहा है। इससे यह बैक्टीरिया छह भिन्न वर्ग के कीटनाशकों का खात्मा करने की क्षमता हासिल कर लेगा।
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यह बैक्टीरिया इस लिए भी अलबेला है क्योंकि अब तक खोजे बैक्टीरिया एक ही कीटनाशक को समाप्त करते थे। लेकिन इससे कई कीटनाशकों को समाप्त करने में मदद मिलेगी।
ये बैक्टीरिया जहां रहते हैं वहां वातावरण के हिसाब से अपने डीएनए को चेंज कर लेते हैं और अधिक मात्रा में पनपने लगते हैं। इसलिए इनका व्यावसायिक रूप से लाभ उठाना संभव है।
- डॉ. रंजना पठानिया, वैज्ञानिक
सबसे ज्यादा कीटनाशक भारतीयों के पेट में
आंकड़े बताते हैं कि एक औसत भारतीय अपने दैनिक आहार में 0.27 मिलीग्राम डीडीटी भी अपने पेट में डालता है।
जिसके फलस्वरूप शरीर के ऊतकों में एकत्रित हुए डीडीटी का स्तर 12.8 से 31 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) यानी विश्व में सबसे ऊंचा है।
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इसी तरह गेहूं में कीटनाशक का स्तर 1.6 से 17.4 पीपीएम, चावल में 0.8 से 16.4 पीपीएम है। सभी शरीर में जाते हैं।
कीटनाशकों से होने वाली बीमारियां
शुरुआत में सिरदर्द, त्वचा समस्या, अल्सर और फिर कैंसर का। मितली, डायरिया, दमा, साइनस, एलर्जी, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और मोतियाबिंद बीमारी।
स्तनपान के जरिए विकलांगता, महिलाओं में स्तन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी इनमें शामिल हैं।