27 सितंबर को आईएमए से पासआउट हुए बैच के स्वर्ण जंयती समारोह में रिटायर अफसरों ने पुरानी यादों को साझा किया। 50 बरसों में आईएमए में बदली ट्रेनिंग और सुविधाओं में बदलाव हुए हैं।
रिटायर अफसरों ने बताया कि ट्रेनिंग पाठ्यक्रम अब बेहद आधुनिक हो गया है। अब काउंटर इनसर्जेंसी (आतंकवादी से निपटने), साइबर वार जैसे विषयों में अफसर ट्रेंड किये जा रहे हैं जबकि पहले यह चीजें नहीं थी। पहले सेना एक नौकरी नहीं जीने का अंदाज थी लेकिन अब ऐसा नहीं हैं।
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स्वर्ण जयंती समारोह को लेकर पत्रकार वार्ता में ब्रिगेडियर केज बहल ने 19 दिसंबर को आईएमए कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल मानवेंद्र सिंह ने पचास बरस में प्रशिक्षण कार्यक्रम किस तरह बदले हैं उनके बारे में अवगत करवाया।
ब्रिगेडियर बहल ने बताया 1963 बैच के अफसरों ने 1965 और 1971 का युद्ध लड़ा है, जो भारतीय सैन्य इतिहास में सबसे बड़ी सैन्य जीत है। समारोह के दौरान वार मेमोरियल में शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई।
दिया स्मृतिचिन्ह
समारोह के दौरान पासआउट बैच ने आईएमए को स्मृति चिन्ह प्रदान किया जबकि आईएमए ने सभी अफसरों को एक फोटो फ्रेम दिया जिसमें जब वह 1963 में आईएमए पहुंचे थे तब का और आज का फोटोग्राफ है। समारोह के संयोजक कर्नल केएस मान सहित बैच के कई अधिकारी इस मौके पर मौजूद रहे।
6 माह चली ट्रेनिंग
सेकेंड इमरजेंसी कोर्स में शामिल कैडेट्स को मात्र 6 माह की ट्रेनिंग दी गई थी, जबकि नियमित कोर्स की दो बरस ट्रेनिंग होती है। सख्त ट्रेनिंग के चलते कोर्स में 357 कैडेट पास ही नहीं कर पाए। कर्नल दर्शन सिंह ने बताया कि ट्रेनिंग इतनी सख्त थी कि उन्हें अकादमी आने के बाद केश धोने के लिए 27 दिन बाद समय मिला।
पत्नियों की अहम भूमिका
अफसरों संग आई उनकी पत्नियां मानती हैं कि सेना एक परिवार की तरह है। कर्नल मान की पत्नी रमी मान ने बताया कि जवान के परिवार की हर समस्या को जानने के लिए पत्नियों की कई तरह की गतिविधियां होती हैं जिससे रिश्ते और बेहतर और मजबूत होते हैं।
आईएफएस और आईपीस भी बने
समारोह में लगभग 80 अफसर पहुंचे थे, जिसमें सेना से पांच वर्ष की सेवाओं के बाद कई अफसर आईएएस, आईएफएस और आईपीएस भी बने। समारोह में आईपीएस, जज एडवोकेट, आईएफएस, डीजी फारेस्ट, पीसीएस रैंक तक पहुंचे पूर्व सैन्य अधिकारी भी पहुंचे हुए थे।