उत्तराखंड के वन तस्करों को अब शिकार करने के बाद भागने का मौका नहीं मिल पाएगा। वन विभाग का एंटी पोचिंग सेल अब नय स्वरूप में मिलने वाला है।
सेल महज एक औपचारिकता भर
खासकर कमजोर हो चुके सूचना तंत्र में नई जान फूंकने की तैयारी है। सेल के नए हेड मुख्य वन संरक्षक डॉ. धनंजय मोहन ने इसकी प्लानिंग तैयार कर ली है। पिछले कुछ वर्षों में यह सेल महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है।
खासकर मुखबिर तंत्र तो खत्म ही हो चुका है। स्थिति यह है कि तस्करी या शिकार के मामलों की सूचना सेल को मीडिया में खबर आने के बाद मिलती है। सेल की जिम्मेदारी संभालने के बाद डॉ. धनंजय मोहन ने नई कार्ययोजना तैयार की है।
इसके तहत प्रदेश में एक सेंट्रल सूचना तंत्र विकसित किया जाएगा। इस केंद्र को पोचिंग एजेंसी, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो, अन्य प्रदेशों की एंटी पोचिंग सेल से लिंक किया जाएगा।
इसका फायदा यह होगा कि किसी भी घटना की सूचना सभी एजेंसियों को तुरंत मिल जाएगी और शिकारी पर शिकंजा कसा जा सकेगा।
डॉ. धनंजय मोहन ने बताया कि प्रदेश में पोचिंग रोकने के लिए सीमा क्षेत्रों में आईटीबीपी और सेना से भी तालमेल बनाया जाएगा। जल्द ही दिल्ली में एक बैठक होने जा रही है, जिसमें वन विभाग के अधिकारी शिरकत करेंगे।
यह बैठक वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की ओर से कराई जा रही है। बैठक में तस्करी रोकने के लिए नई कार्ययोजना पर बात की जाएगी।
बजट बढ़ाने की भी मांग
एंटी पोचिंग सेल के लिए प्रदेश में बेहद कम बजट दिया जाता है। इस साल सीक्रेट फंड के लिए करीब 2.5 लाख रुपये दिए गए थे जो कि जून माह में ही खत्म हो गए।
सीक्रेट फंड खाली होने के कारण मुखबिरी का तंत्र कमजोर पड़ गया है। एंटी पोचिंग सेल के हेड डॉ. धनंजय मोहन ने कहा कि उन्होंने सरकार से बजट बढ़ाने की मांग की है ताकि मजबूत नेटवर्क खड़ा किया जा सके।