उत्तराखंड के पहाड़ों में पर्वतराज हिमालय को आज भी अपने अंदर कई लोक परंपराओं और किवदंतियों को संरक्षित रखे हुए है। यहां अभी भी कई गांवों में पेड़-पौधों को देवता तुल्य समझकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
और तो और बुग्यालों में लोग नंगे पांव चलकर तेज आवाज में बात तक नहीं करते। माना जाता है कि यहां तेज आवाज से वन देवता नाराज होकर दोष करता है।
आज भी हिमालय में जिंदा हैं मान्यताएं
हिमालय से लगे उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी, मोरी, पुरोला ब्लाक के कई गांव में आज भी लोक मान्यताएं जिंदा है। गांव में लोग अभी भी पय्यां, बेलपत्र, केला, पीपल, बांज आदि पेड़-पौधों में देवी-देवताओं का वास मानकर उनकी पूजा करते हैं।
भटवाड़ी के पाला गांव निवासी नवीन रावत बताते हैं कि क्षेत्र के ग्रामीण आज भी बुग्यालों में नंगे पांव चलते हैं। बुग्यालों में पहुंचने पर कोई भी तेज आवाज में बात नहीं करता है। यहां तक कि पेड़-पौधों की पत्तियां भी हाथ जोड़ने के बाद तोड़ी जाती है।
आज भी प्रकृति की पूजा
ग्रामीण आज भी प्राकृतिक स्रोत और नदियों की पूजा करते हैं। हिमालय जड़ी-बूटी एग्रो संस्थान जाड़ी के सचिव द्वारिका प्रसाद सेमवाल बताते हैं कि हिमालय संरक्षण में लोक मान्यताओं की अहम भूमिका है, लेकिन मान्यताओं का प्रचार-प्रचार कर इन्हें संजोए रखने की जरूरत है। ताकि न सिर्फ पहाड़वासी इन मान्यताओं को माने, बल्कि बाहर से आने वाले लोग भी इनका पालन करें।