फसल को बचाने में किसान नहीं छोड़ रहे कोई कसर, साड़ियों से लेकर गानों तक को अजमाया
ऐसा नहीं है कि किसानों की ओर से फसलों को बचाने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। वन्य जीवों से फसल बचाने की हर संभव कोशिश फिलहाल किसान करते नजर आ रहे हैं। मुसीबत ये है कि इनको पूरा सहयोग नहीं मिल पा रहा है और मौसम में बदलाव के कारण यह समस्या अब और विकट होती जा रही है। कहीं बंदर रजिस्टर बनाए गए तो कहीं हनी सिंह के गाने बजाए गए। कहीं खेतों के चारों ओर साड़ियों को लगाया गया, तो कहीं लोगों ने सामूहिक रूप से खेतों की चौकीदारी का बीड़ा उठाया। इतना सब कुछ करने के बाद भी लोगों को कोई स्थायी हल नहीं मिल पाया है।
सोमेश्वर घाटी में बंदर रजिस्टर
कुमाऊं की सोमेश्वर घाटी के कुछ गांवों ने बंदरों से फसलों को बचाने के लिए गांव के स्तर पर रोस्टर तय किया गया। इनकी ओर से प्रत्येक दिन के लिए अलग-अलग पांच परिवारों की ड्यूटी लगाई गई। पांच से सात महिलाओं का यह समूह लोहे के कंटरों को पीट कर और अन्य तरीकों से बंदरों को खेतों से दूर रखने का काम करता है। लेकिन यहां मुख्य चुनौती आलू, गडेरी आदि को जंगली सुअरों से बचाने की है। ये जंगली सुअर रात को आते हैं और पूरा खेत खोद डालते हैं।
हाथियों से बचने को एनाइडर
जंगली हाथियों से फसल को बचाने के लिए वन विभाग ने हल्द्वानी के जीतपुर क्षेत्र के गांवों में यह प्रयोग किया था। इसमें एनीमल डिटेक्श्न एंड रिपेलेंट सिस्टम को विकसित किया गया। दिल्ली के एक युवा छात्र ने इस तकनीक का पहले एक गांव में प्रयोग किया था। एनाइडर में लगा सेंसर कुछ मीटर की दूरी पर ही वन्य जीव की उपस्थिति का एहसास कर लेता है और उसके बाद जोर से साइरन बजाता है। अचानक हुई सायरन की आवाज से जानवर डर कर दूर हो जाता है। वन विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक हाथियों के मामले में यह तकनीक सफल हुई है लेकिन बंदर इससे खेलने लगते हैं। फिर भी यह तकनीक व्यापक स्तर पर अपनाई नहीं गई।
खेतों में हनी सिंह के गाने
भवाली के एक गांव में यह प्रयोग किया गया। गांव में खेतों पर डैक लगाकर गाने बजाए गए। यह पाया गया कि खेतों से बंदर कुछ समय तक दूर रहे। लेकिन यह प्रयोग व्यवहारिक साबित नहीं हुआ। यह पाया गया कि हर जगह इस तरह से गाने नहीं बजाए जा सकते।
खेतों में रंग बिरंगी साड़ियों की फैं सिंग
पर्वतीय जिलों की ओर निकलने वालों को अक्सर ऐसे खेत दिखाई देंगे जो रंग बिरंगी साड़ियों से घिरे हुए हों। यह प्रयोग एक तरह से बंदरों के बजरबट्टूू की तरह का है। लोगाें के मुताबिक कुछ हद तक इससे बंदरों की समस्या सुलझी। लेकिन जंगली सुअर, नील गाय आदि की समस्या जस की तस रही।
लोगों को पैसे मिलते तो कुछ होता
- मैने प्रदेश सरकार से कहा था कि विधायक निधि का उपयोग वन्य जीवों से फसलों को बचाने के लिए हो रहे प्रयोगों पर खर्च करने की अनुमति दी जाए। अल्मोड़ा में ताकुला गांव का एक किसान है कुंदन। उसने कुछ पैसे जुटा कर आलू के खेत के चारों ओर टिन की बाड़ की। पहली ही फसल में उसे लागत वापस मिल गई। इसी तरह कई अन्य जगह प्रयोग हुए। 70 विधायक 70 विधानसभाओं में इस तरह के प्रयोगों को फाइनेंस करते तो कुछ बात बनती। हैस्को ने एक फलदार जंगल विकसित किया। फायदा यह हुआ कि मानव वन्यजीव संघर्ष कम हुआ। जंगली जानवरों के प्रकोप से लोग मायूस हैं।
- अनिल जोशी, संस्थापक निदेशक, हैस्को
- जहां संभव हो वहां बांस सहित अन्य कंटीली झाड़ियों की फैंसिंग की जाए
- सोलर फैंसिंग
- कृषि विभाग की ओर से कुछ खास क्षेत्रों में पांच फिट की दीवार और इसके ऊपर कंटीली तारबाड़ का भी प्रयोग किया गया। पहाड़ मेें बिखरे खेते होने के कारण यह प्रयोग अधिक किसानों ने नहीं अपनाया।
- पॉलीहाउस के जरिए नियंत्रित स्थिति की खेती। प्रगतिशील किसान इस तरीके को अपना रहे हैं।
- ऐसी फसलों की खेती जिसकी ओर जंगली जानवर आकृष्ट न हों
...ये भी है एक तरीका
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में वन्य जीवों से फसल नुकसान का मुआवजा दिया जाए। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक केंद्र से यह मांग की जा चुकी है। यह होता है तो किसान कम से कम खेती करना नहीं छोड़ेंगे।
अल्मोड़ा जिले का महत गांव
वन्य जीव नुकसान
जंगली सुअर 70 प्रतिशत
बंदर 2.61 प्रतिशत
हिरन 44.70 प्रतिशत
साही 2.61
चूहा 7.89
खरगोश 3.30
गांव के लोगों ने जंगली जानवरों से फसल को बचाने के लिए रोस्टर बनाया हुआ है। सभी बारी-बारी से पहरा देते हैं। इतने पर भी नुकसान कम नहीं हो रहा है। लोग मायूस हैं, क्या करें।
- प्रवीण मेहता, महत गांव प्रधान