देश में हर साल डिग्री लेकर निकलने वाले करीब डेढ़ लाख इंजीनियर युवाओं में से महज 25 प्रतिशत ही नौकरी के योग्य होते हैं। बाकी के 75 प्रतिशत क्यों रह जाते हैं बिना नौकरी के जानने के लिए पढ़ें...
इंजीनियर बनने वाले युवाओं में सबसे बड़ी कमी प्रोफेशनलिज्म की होती है। इस कमी को दूर करने की बेहद सख्त जरूरत है। द इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के सभागार में उत्तराखंड तकनीकी विवि के तत्वावधान में शुरू हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में विशेषज्ञों ने ये बात बताई।
सेमिनार का शुभारंभ दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) के एमडी डॉ. मंगु सिन्हा ने किया। उन्होंने इंजीनियर युवाओं में प्रोफेशनल स्किल्स की सख्त जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि पढ़ाई के दौरान ही शिक्षण संस्थानों में इस पर काम होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दिल्ली मेट्रो के लिए नियमों की छूट दी गई है, वैसे ही अन्य विकास कार्यों में भी छूट दी जानी चाहिए। सेमिनार में इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट रिसर्च एंड एजूकेशन के महानिदेशक डॉ. अश्विनी कुमार ने किसी भी इंजीनियर के लिए टैलेंट, एटीट्यूड और कार्यक्षमता बढ़ोतरी पर बल दिया।
सेमिनार में तकनीकी विवि के कुलपति प्रो. पीके गर्ग ने कामयाब इंजीनियर बनाने के लिए चार सी (कॉलेबरेशन, क्रिटिकल, कम्यूनिकेशन और क्रिएटिविटी) पर बल दिया। मुख्य वक्ता आईएमएस यूनिसन विवि के चांसलर प्रो. एमपी जैन ने हार्ड और सॉफ्ट स्किल पर बल दिया।
हिमालयन ड्रग्स के मालिक डॉ. एस फारूख ने कहा कि विकास के लिए जरूरी है कि अत्याधुनिक तकनीक और नए प्रयोगों पर इंजीनियर का फोकस हो। सेमिनार में अमेरिका से आई दीप्ति दीक्षित, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के चेयरमैन सीएम डिमरी, नरेंद्र सिंह, विभा मल्होत्रा, डॉ. पूनम सिन्हा, डॉ. डीसी गुप्ता, प्रो. स्वाति बिष्ट आदि ने भी विचार व्यक्त किए।
एआईसीटीई को जाएगी रिपोर्ट
विशेषज्ञों ने प्रोफेशनल स्किल ट्रेनिंग एनहांसमेंट का सिलेबस भी तैयार किया है। दो दिन के इस सेमिनार में तैयार होने वाले सिलेबस को देशभर में लागू करवाने के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) को भेजा जाएगा।
ये सिलेबस देशभर में लागू हुआ तो आने वाले वक्त में इंजीनियर सबसे आगे होंगे। वह न केवल फर्राटेदार अंग्रेजी बोलेंगे बल्कि टीम लीडरशिप, ईमानदारी और व्यवहार में भी मिसाल बनेंगे।