वन विभाग और एनजीओ ट्रैफिक इंडिया की संयुक्त कार्रवाई में 35 कछुओं संग एक तस्कर को दबोच लिया गया।
युवक को भेजा जेल
सभी कछुए शेड्यूल 1 (विलुप्त प्राय जीव की श्रेणी) के बताए जा रहे हैं। वन विभाग ने युवक को जेल भेज दिया है। गुरुवार को ट्रैफिक इंडिया संस्था की सूचना पर वन विभाग के अधिकारी आईएसबीटी पहुंचे।
बाइकसवार एक युवक को रोका गया। तलाशी में उसके पास से 35 कछुए बरामद हुए। युवक ने अपना नाम कुलदीप कुमार निवासी लक्सर बताया। सभी कछुए अभी छोटे हैं और इनका वजन 200 से 300 ग्राम के बीच है।
पूछताछ में कुलदीप ने बताया कि उसने अपने गांव के तालाब से ये कछुए पकड़वाए थे। बताया कि दून के कुछ एक्वेरियम संचालकों को ये कछुए 300 रुपए प्रति कछुआ के हिसाब से दिए जाने थे।
कुलदीप ने बताया कि एक्वेरियम संचालक ढाई से 3000 रुपए प्रति कछुआ वसूलते हैं। वन विभाग ने युवक को हिरासत में लेकर बाइक सीज कर दी।
बाद में कछुओं को जांच के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्लूआईआई) भेजा गया। संस्थान ने बताया कि 33 कछुए इंडियन टेंट टर्टल और दो स्पाटेड पांड टर्टल प्रजाति के हैं। दोनों ही प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं।
...तो दून में हैं बड़े शौकीन
सूत्र बताते हैं कि कछुए को घर में खुशी और तरक्की लाने का प्रतीक मानकर दून में कई लोग इन्हें एक्वेरियम में रखते हैं।
हालांकि, कछुओं की अधिकतर प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं, इससे इन्हें घर में रखना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद वन विभाग इस पर लगाम कसने में नाकाम है।
खास बात यह है कि विभाग उन एक्वेरियम संचालकों पर भी कार्रवाई नहीं कर रहा, जहां से कछुए बेचे जा रहे हैं।
बताया जाता है कि शहर के अधिकतर एक्वेरियम शोरूमों में कछुओं के लिए खाना बेचा जाता है, जो साफ बताता है कि कछुए बेचे जा रहे हैं।
छह-आठ माह रहते हैं जिंदा
लोग वास्तुशास्त्र के मुताबिक कछुए को एक्वेरियम में तो रखते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि कछुओं के जीवित रहने के लिए पानी के साथ जमीन भी जरूरी है।
एक्वेरियम में रहने वाले कछुए बमुश्किल छह से आठ माह तक ही जीवित रह पाते हैं। वन विभाग का तर्क है कि ऐसे कछुए क्या शुभ फल देंगे, जिनकी जान ली जा रही है।
सूचना पर हमने एसडीओ गुलवीर सिंह की टीम को मौके पर भेजा। तस्कर को पुलिस अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है। वन अपराध अधिनियम के तहत रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है। शेड्यूल 1 के जीव संग पकड़े जाने पर जमानत नहीं मिलती है।
- सुशांत पटनायक, डीएफओ, देहरादून