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द्रोणागिरी गांव में बढ़ रहा याक का कुनबा

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गोपेश्वर। चमोली जिले के नीती घाटी के द्रोणागिरी में याक (हिमालय का ऊंट) का कुनबा बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2014 तक पशुपालन विभाग की ओर से किए गए सर्वे की रिपोर्ट में घाटी के द्रोणागिरी गांव में 13 याक (5 नर व 8 मादा) थे, जो अब बढ़कर 21 हो गए हैं। ये याक दुर्लभ प्रजाति के हैं और जिले के पशुपालन विभाग के संरक्षण में रहते हैं। इस बार की यात्रा में तो यात्रियों को याक की सवारी भी कराई गई है।
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वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान तिब्बत की ओर से दुर्लभ प्रजाति याक का एक समूह भारतीय सीमा क्षेत्र में पहुंच गया था। भारतीय सेना ने इन्हें जिला प्रशासन को सौंप दिया। इसके बाद से चमोली जिले का पशुपालन विभाग इन याकों की देखरेख करता है। मौजूदा समय में जिले में 21 याक (8 नर व 13 मादा) हैं। उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में 74 याक हैं। याक हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 8000 फीट की ऊंचाई पर पाया जाने वाला पशु है। 15 से 20 दिन तक याक बर्फ खाकर भी जीवित रह सकता है। इसलिए इसे हिमालय का ऊंट कहा जाता है। पूर्व में अत्यधिक बर्फबारी के कारण छह याक मर गए थे, लेकिन कुछ सालों से याक का झुंड शीतकाल में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाने के बजाय द्रोणागिरी गांव के निचले क्षेत्र सुराईथोटा में ही रहने लगे हैं, जिस कारण इनका कुनबा भी बढ़ने लगा है। जिले के पशुपालन विभाग ने स्वरोजगार को बढ़ाया देने के लिए पहली बार याक की सवारी शुरू करने की योजना बनाई थी। इस बार बदरीनाथ धाम में यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को याक की सवारी भी कराई गई। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. शरद भंडारी का कहना है कि द्रोणागिरी गांव में याक का कुनबा बढ़ रहा है। द्रोणागिरी क्षेत्र में 21 याक विचरण करते देखे गए। पशुपालन विभाग की टीम लगातार याक की मॉनीटरिंग करती हैं।
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