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पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी की पुस्कतें आज भी प्रांसगिक

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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
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शहीद महाराज प्रद्युम्न शाह समिति खुड़बुड़ा की ओर से रविवार को टिहरी रियासत के वजीर रहे पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी की 85वीं पुण्यतिथि पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी के सामाजिक और साहित्यिक योगदान पर चर्चा की।
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अखिल भारतीय किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह सजवाण ने कहा कि महाराजा कीर्ति शाह बहुत विद्वान व्यक्ति थे। उन्हें एक ऐसे वजीर की जरूरत थी जो राज्य की वित्तीय स्थिति को मजबूती देने के साथ जनता को खुशहाली दे सके। महाराजा की इस खोज में पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी खरे उतरे और 14 अक्टूबर 1908 तक महाराज कीर्ति शाह के वजीर रहे। इसके बाद महाराजा नरेंद्र शाह के सलाहकार बने। अपने जीवन काल में उन्होंने शासन, प्रशासन, रीति रिवाज, पूजा पाठ पर कई यादगार पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों की प्रासंगिकता आज भी है। इसके पहले पंडित हरिकृष्ण ने गढ़वाल का इतिहास लिखकर एडविन टी एटकिंसन के बाद दूसरे लेखक का खिताब पाया। मुख्य अतिथि डॉॅ. योगंबर सिंह बर्थवाल ने कहा कि वजीर हरिकृष्ण रतूड़ी ने गांव-गांव भ्रमण कर 1810 में ‘टिहरी गढ़वाल का भूगोल’ पुस्तक लिखी। इसके अलावा वजीर रतूड़ी की सलाह पर राजाओं ने नीतियां लागू कीं। परिणामस्वरूप राजशाही के साथ ही राज्य की जनता भी समृद्ध हुई। शहीद प्रद्युम्न शाह समिति के अध्यक्ष शीशपाल गुसांई ने कहा कि कानून और रीति रिवाज पर आधारित पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी की ‘नरेंद्र हिंदू लॉ’ पुस्तक अविस्मरणीय है। पुराना दरबार ट्रस्ट के अध्यक्ष भवानी प्रताप सिंह पंवार ने कहा किए पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी राजशाही के सबसे काबिल वजीरों में शुमार थे। समाजसेवी कुसुम रावत ने पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी के साहित्य संरक्षण पर जोर दिया। डॉ. अर्चना डिमरी ने पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी पर शोध की जरूरत बताई। पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी के पौत्र एडवोकेट आशीष रतूड़ी ने कहा कि 100 साल पहले लिखी गई पांच पुस्तकों की प्रासंगिकता गौरव की बात है। पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी जयाला गांव प्रताप नगर टिहरी के मूल निवासी थे। 14 अक्टूबर 1908 तक महाराज कीर्ति शाह के वजीर रहे। इसके बाद महाराजा नरेंद्र शाह के सलाहकार रहे। उनका देहांत 20 मई 1933 को हुआ। गोष्ठी में रमेश सिंह, शूरवीर सिंह, चंद्र दत्त सुयाल, दिनेश सेमवाल, राजेंद्र काला समेत कई उपस्थित रहे।
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