न वो आ रहे, न उनकी कोई खबर। केदारनाथ जलप्रलय में अपनों से बिछुड़े लोग पथराई आंखों से उन्हें तलाश रहे हैं। हेलीपैड, कंट्रोलरूम, हाकिम-हुक्काम के वहां दौड़ लगाने में लोग चकरघिन्नी बने हुए हैं।
कई मायूस होकर अखबारों के दफ्तरों में चक्कर काट रहे हैं। आपदा किसे लील गई, कौन उससे बच निकला, कहां, किस हाल में है, कुछ पता नहीं लग पा रहा। दिल धड़क रहा है। कहीं कुछ बुरा तो नहीं हुआ। जब शव नहीं मिले तो कैसे समझ लें कि अपने हमेशा के लिए जुदा हो गए।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
नाउम्मीदी के घुप्प अंधेरे में भी कहीं से उम्मीद का एक नन्हा दीया टिमटिमाता है। कोई पहाड़ी रास्तों में अपनों की तस्वीर चस्पा किए हुए पोस्टर लगाता है तो कोई सार्वजनिक स्थानों पर फोटो।
काश! कहीं से कोई अच्छी खबर आए। कोई तो बताए उनका अपना यहां सलामत है। जितनी भाग-दौड़ कर सकते हैं, कर रहे हैं। बाबाओं और ज्योतिषियों की भी शरण ली जा रही है।
तलाश में दर-दर भटक रहा
मुजफ्फरपुर का बंका परिवार अपने 15 साल के लाड़ले माधव की तलाश में दर-दर भटक रहा है। कई नामी ज्योतिषियों के दर पर चक्कर काट आए। ज्योतिषी दिलासा देते हैं कि माधव जहां भी है, सुरक्षित है। इसलिए भागदौड़ और भी बढ़ गई है।
केदारनाथ में जब सैलाब आया तब रांची में एक बैंककर्मी धर्मशील झा की पत्नी संजू झा (46) पालकी पर सवार थीं।
धर्मशील उनके पीछे पैदल चल रहे थे। बाबा के दर्शन के बाद लौट रहे थे। सैलाब आया तो अफरा-तफरी में बिछड़ गए। बाद में धर्मशील किसी तरह से बचकर निकले। देहरादून के अस्पताल में जेरे-इलाज हैं। संजू का पता नहीं चल रहा। परिजन बताते हैं कि उनके पर्स में काफी रुपये और गहने थे।
आशंका सताती है कहीं पालकी सवारों ने तो ‘कुछ’ नहीं कर दिया। फिलहाल कहीं से कोई खबर नहीं आ रही है। ऐसे कितने ‘माधव’ और ‘संजू’ हैं जिनके फोटो एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों और पहाड़ से उतरने वाली सड़कों पर सार्वजनिक स्थानों पर लगे हैं।
लोगों के बारे में बताओ और नगद इनाम पाओ
अपनों की तलाश में आए परिजनों का धैर्य अब खोने लगा है। कई ऐसे हैं जिन्होंने अपने लापता परिजनों के बारे में बताने के एवज में नगर पुरस्कार देने की पेशकश की है।
हरिशंकर मिश्रा, रवि चंदेल, मुकेश श्रीवास्तव और रवि सैनी के मां-बाप लापता है। पुलिस की लिस्ट देख ली, हर पूछताछ केंद्र में पता कर लिया। अब धैर्य ने जवाब दे दिया है। लेकिन मन है कि मानता नहीं कि परिजन अब इस दुनिया में नहीं रहे।
गुरुवार को इन लोगों ने पुलिस लाइन में अपने परिजनों की गुमशुदगी दर्ज कराई।
साथ ही नगद पुरस्कार की भी घोषणा की। रवि चंदेल बताते हैं कि जो भी उनके लापता परिजनों के बारे में कुछ जानकारी देगा, उसे पांच हजार रुपये दिया जाएगा।
कानून का भी सितम झेलना होगा
कई ने अपनों को नजरों के सामने दम तोड़ते देखा। कई नाउम्मीद भी हो चुके। कलेजे पर पत्थर रखकर यह भी मानने को तैयार हैं कि अपने अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन कायदे-कानून उनकी मदद नहीं करेंगे। कागज-पत्तर, बीमा, विरासत सभी में मौत का सर्टिफिकेट चाहिए। मौत के लिए शव चाहिए।
शव भी नहीं मिल रहे। अगर सरकारी आंकड़ों पर भी यकीन करें तो जलप्रलय में एक हजार लोग मारे गए। बमुश्किल 50 के शव मिले हैं। तीन-चार की पहचान हो पाई है। ज्यादातर शवों की अंत्येष्टि लावारिस समझकर की जा रही है। हरिद्वार जैसे स्थान पर तो डीएनए सैंपल लेने की बात कही गई है। हर जगह यह मुमकिन नहीं है।
सात साल लापता होने पर ही मृत मानता है कानून
जो लापता हैं उनको मृत मान लें यह भी संभव नहीं है। सबूत का कानून कहता है कि कम से कम सात साल कोई लापता रहे तब माना जाएगा कि किसी व्यक्ति विशेष की मौत हो गई है।
इंडियन एवीडेंस एक्ट 1872 की धारा 108 में साफ-साफ लिखा है कि जब कोई व्यक्ति लगातार सात साल तक गायब रहे और उन व्यक्तियों द्वारा न देखा, सुना जाए जिनके उसे जिंदा रहते देखने-सुनने की संभावना थी, तभी उस व्यक्ति की मृत्यु की उपधारणा की जाएगी।
ऐसे में कलेजे पर पत्थर रखकर अपनों की मौत साबित करने के लिए भी सात साल का इंतजार करना पड़ेगा।