जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ... लेकिन हमें आज घटी इस घटना से सबक लेना भी जरुरी है, हिमालयी क्षेत्रों में अनावश्यक भारी जनदबाव अनैतिक दोहन व बेतरतीब ढंग से हो रहा विकास भी इस सब के लिए जिम्मेदार है।
देखिये जरा गौर से चालीस से पचास के दशक के केदारनाथ धाम की यह तश्बीर तब यहां सिर्फ गिनती की 8-9 झोपड़ियां हुआ करती थी, वह भी घास फूस की, क्या आम और क्या खाश सबके आशियाने यही थे। लेकिन देश स्वतंत्र हुवा महत्वकांक्षाएं भी बढ़ी इस सब के बीच बेतहाशा विकास की दौड़ भी चलने लगी नतीजतन चन्द सालों में ही साधना के इस धाम में विकास रूपी कंक्रीट के जंगल ने एक आधुनिक नगर की शक्ल ले ली थी।
लेकिन आज की इस तश्वीर को भी देखिए और चालीस के दशक की ब्लैक एण्ड व्हाइट तश्वीर के साथ मिलान कीजिए उसी हालत में पाएंगे आप ओघड़ बाबा की समाधिष्ठ धाम को। क्या कहियेगा इसे प्रकृति का प्रकोप या चतुर इंसान को प्रकृति का तमाचा ?
मै बार बार अपने मीडिया से जुड़े भाई बहनों से भी संवाद कर रहा हूं कि सितम्बर माह में आयोजित होने वाली नंदा देवी राज जात यात्रा में अनावश्यक लोगों को हिमालय में ना जाने की अपील की जानी चाहिए। यह बात सभी को समझ लेनी होगी कि नंदादेवी राजजात यात्रा कोई उत्सव नहीं है और न ही यह सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि ये तो हिमालयी क्षेत्र के खाशकर चमोली, अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ जनपदों के कुछ ही परिवारों की पारिवारिक दोष मुक्त पूजा है, जिसे चंद चतुर लोगों ने हिमालयी महाकुम्भ का नाम दे दिया है और सरकारी खजाने को ठिकाने लगाने का जरिया भी बना दिया है।
इस वर्ष आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा में अंदाजा लगाया जा रहा है कि पुरे विश्वभर से लगभग डेढ़ लाख लोग इस हिमालयी यात्रा का हिस्सा बनेंगे। लेकिन सरकार और खाशकर उत्तराखंड वासियों को आज केदारनाथ में हुई इस भयानक देवीय प्रकोप या प्राकृतिक आपदा को भी नहीं भूलना होगा जहां आज कई बेकसूर लोग जिन्दा मलवे में दफ़न हो गए हैं।
अब बात फिर से नंदादेवी राजजात की करते हैं, मैं भी एक पत्रकार होने के नाते पूर्व में हुई नंदादेवी राजजात का रूपकुंड, बेदनी कुंड व नंदा देवी लोकजात यात्रा बालपाट, सिम्बाई बुग्याल और दंन्यनाली होते हुवे सप्तकुण्ड यात्रा का हिस्सा बन चुका हूं।
मेरा बहुत बुरा अनुभव रहा है भले ही यह यात्रा बादलों के ऊपर सैर करने का आपको एहसास करवाती है। कभी रोमांच, कभी रहस्य तो आश्चर्य में डाल देने वाली यह यात्रा सिर्फ और सिर्फ भगवान भरोसे चलती है जंहा कोई निश्चित रास्ते व पुख्ता जानकारी तक नहीं होते हैं भले ही सरकारी कागजों में सब ठीक-ठाक सजा हुआ रहता है।
मेरा मकसद मुद्दे को भटकाना या यात्रा पर किसी तरह का प्रश्न चिन्ह लगाना नहीं है बल्कि आने वाले खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करना है कि अगर आप यहां होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा का हिस्सा बनने का मन बना रहे हैं तो कम से कम आज केदारनाथ में हुवे इस हिमालयी उत्पात को भी जरुर ध्यान में रखियेगा।
केदारनाथ में तो सारी आधुनिक सुविधाएं आपके हाथों में थी लेकिन नन्दादेवी राजजात यात्रा में क्या? जहां न घोड़ा होगा न गाड़ी होगी...बस सब कुछ आपको अपनी पीठ पर लाद कर लेजाना होगा और कडकडाती ठण्डी रातें गुजारनी होंगी तो साथ में रखीं मामूली पन्नियों के सहारे, इसलिए इस यात्रा का हिस्सा जरुर बनिए लेकिन दिल से नहीं बल्कि दिमाग से। किसी भी प्रकार के अति उत्साही करने वाले विज्ञापनों के भ्रम जाल में भी न फसें। आपकी जान आपकी अमानत।
शशि भूषण मैठाणी
(लेखक देहरादून के यूथ आइकॉन हैं और यह लेख उनके ब्लॉग से लिया गया है।)