हमने ऐसा खौफनाक मंजर आज तक नहीं देखा था। चारों ओर नदी, नालों के बीच जिंदगी जैसे ठहर सी गई थी। वाहे गुरु की कृपा से हम बचकर आ गए हैं। आज हमने जब सेना के जवान देखे तो, ये हमें देवदूत लगे। जो हमें मौत के मुंह से निकालने के लिए आए थे।
फफक-फफक कर रो पडे़
लेकिन गोविंदघाट में अभी भी चार हजार से अधिक यात्री फंसे हुए हैं। उन्हें बचा लो। गोविंदघाट में चार दिन से फंसे करनाल के तीर्थयात्रियों के दल को जब बुधवार को गढ़वाल स्काउट के वाहन से पीपलकोटी पहुंचाया गया। दल से ‘अमर उजाला’ ने गुजरे चार दिनों के बारे में पूछा, तो वे फफक-फफक कर रो पडे़। वह एक ही सांस में आप-बीती सुनाने को बेताब थे।
जैसे कागज के टुकडे़ हों
करनाल के तीर्थयात्री अमरिंदर सिंह, निरवेद सिंह और अमरजीत सिंह ने बताया कि 15 जून की रात्रि को वे जोशीमठ पहुंचे। हल्की बारिश के बीच वे 16 जून को गोविंदघाट पहुंचे। यहां मूसलाधार बारिश के चलते वे हेमकुंड साहिब जाने का साहस नहीं जुटा पाए। लेकिन इसी रात अलकनंदा नदी का जल स्तर बढ़ा, तो वो खौफनाक मंजर नजर आया। वाहन नदी में ऐसे बह रहे थे, जैसे कागज के टुकडे़ होंगे।
नहीं जुटा पा रहे थे साहस
चारों ओर से नदी की कर्कश आवाज के साथ लोगों के चिल्लाने की आवाज सुनाई दे रही थी। रात्रि को हम गोविंदघाट में बदरीनाथ हाईवे की चोटी पर चढ़ गए थे। 17 जून को भी हम भूखे-प्यासे जंगल में ही रहे। यहां करीब पांच सौ स्थानीय लोग भी आए। हम नीचे उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
रात्रि को स्थानीय लोगों द्वारा लाए गए बिस्कुट खाकर हमने रात बिताई। 18 को आसमान में सेना के हेलीकॉप्टर तो दिखे, लेकिन हमें रेस्क्यू करने कोई नहीं पहुंचा। हमने बचने की आस छोड़ दी थी, लेकिन 19 जून की सुबह दूर से कुछ सेना के जवानों को आते देखा, तो जान में जान आ गई। ये जवान हमें किसी देवदूत से कम नहीं लग रहे थे।