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उत्तराखंड में राजधानी का मुद्दा और उलझा

Fri, 09 Nov 2012 03:06 PM IST
देहरादून/ब्यूरो
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स्थापना दिवस पर उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का सवाल अब और महत्वपूर्ण हो गया है। गैरसैंण में कांग्रेस सरकार की ओर से हुई कैबिनेट और इसके बाद की गई घोषणाओं ने इस मुद्दे को अब और गरमा दिया है। राज्य गठन के 12 साल बाद राजधानी के सवाल पर चुप्पी टूटी है। पर यह कितनी सार्थक होगी, यह अभी धुंधलक में है। स्थायी राजधानी का मुद्दा जस का तस है। बल्कि कहें कि यह मुद्दा अब और उलझ गया है। स्थायी राजधानी का मुद्दा अब सीधे-सीधे दो हिस्सों में बंटा दिख रहा है। गरसैंण में विधानभवन बनने की घोषणा को प्रदेश में स्थायी राजधानी के मुद्दे को दफन किए जाने के रूप में भी देखा जा रहा है।
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ऐसी स्थिति में आगे आने वाले समय में सियासी गुणाभाग सिर्फ प्रदेश को दो अस्थायी राजधानी देने की ओर बढ़ता दिख रहा है। देहरादून के सिर पर अस्थायी राजधानी ताज सजा रहेगा और गैरसैंण भी अस्थायी राजधानी के खिताब से गौरवान्वित होता रहेगा। इसका कारण यह है कि प्रदेश की राजनीति में अब मैदान का दबदबा है और पहाड़ की राजधानी की बात करने वाले को मैदान में कमजोर होने का डर सता सकता है। इसलिए पहाड़ और मैदान के चश्मे से मूल्यांकन करने वाले दल फिलहाल स्थायी राजधानी के सवाल को हल करने से बच सकते हैं। ऐसे में देहरादून के सर से अस्थायी राजधानी का ताज हटाना संभव नहीं होगा और गैरसैंण को ताज पहनाने में मुश्किल होगी। खुद कांग्रेस के सामने अब इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ने के बाद आगे बढ़ने की चुनौती है।

सियासी पंडित पूछ रहे हैं कि गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने की घोषणा करने के बाद अब कांग्रेस आगे क्या करेगी। यह साफ है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठ सकती। लिहाजा गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी की ओर भी बढ़ सकता है। कांग्रेस के अंदर गैरसैंण पर अब तक सबसे अधिक मुखर रहे गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज इस मांग को उठा भी चुके हैं। दूसरी ओर, यह भी माना जा रहा है कि गैरसैंण पर कांग्रेस की सक्रियता से स्थायी राजधानी का मुद्दा अब और सुलग सकता है। यह अब क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व का सवाल भी बन सकता है। यूकेडी ने गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करने की मांग कर इसका संकेत भी दे दिया है। यह भविष्य ही बता सकता है कि क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल कितना दमदार होगा।
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विकास में जनभागीदारी का प्रतीक था गैरसैंण
राजधानी का मुद्दा उत्तराखंड की राज्य प्राप्ति के आंदोलन का अहम हिस्सा रहा है। पूरा आंदोलन गैरसैंण को केंद्र में रखकर भी लड़ा गया। गैरसैंण के बहाने पर्वतीय क्षेत्र के विकास और इस विकास में आम की भागीदारी का सवाल उठाया गया। गैरसैंण प्रदेश की आंदोलित जनभावना की विकास की चाहत का केंद्र बिंदु बना। यही कारण भी रहा कि 1996 में उक्रांद के चुनावी घोषणा पत्र में गैरसैंण को राजधानी का दर्जा दिया गया और इसका नाम बदलकर पेशावर कांड के नायक चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर रखने का सुझाव दिया गया।

अब बदल गई है सोच
प्रदेश में स्थायी राजधानी का मुद्दा अब विकास और विकास में जन की भागीदारी से नहीं तय हो रहा है। यह मुद्दा अब सुविधा, अधिकार और सत्ता से नजदीकी के आधार पर तय करने की कोशिश हो रही है। ऐसे में राज्य आंदोलन में निर्विवादित रहा गैरसैंण अब विवादों में घिर रहा है। दून से लेकर अन्य जिलों के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि सियासी दल एक दूसरे पर गैरसैंण के नाम पर फायदा लेने की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं। राजधानी के लिए बेहतर अवस्थापना, नेटवर्क, कनेक्टिविटी आदि को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दीक्षित आयोग को आठ बार मिला विस्तार
राज्य गठन के तुरंत बाद ही 11 जनवरी 2001 को राज्य की राजधानी तय करने के लिए दीक्षित आयोग का गठन हुआ था। इसके बाद करीब आठ बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया। राजधानी के मसले को तय करने के लिए 2008 में जाकर दीक्षित आयोग की रिपोर्ट सामने आ सकी। आयोग ने भी स्पष्ट किसी एक स्थान का सुझाव नहीं दिया। तत्कालीन भाजपा सरकार ने यह रिपोर्ट हंगामे के बीच सदन के पटल पर रखी थी और इसके बाद इस रिपोर्ट पर न तो खुली बहस ही हो पाई और न ही यह साफ हो पाया कि आयोग की रिपोर्ट पर सरकार करने क्या जा रही है। कारण यह भी था कि दीक्षित आयोग की रिपोर्ट ने राजधानी का मसला आयोग के पाले से निकालकर फिर सरकार के पाले में खिसका दिया था।
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