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वोट बैंक के लिए नदियों में बसा दी बस्तियां

Wed, 03 Jul 2013 09:55 AM IST
देहरादून/ब्यूरो
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हमारे नेताओं पर राजनीति इतनी तारी है कि कुर्सी पाने के लिए उन्होंने हजारों जिंदगियां दाव पर लगा दी। हालांकि अब प्रदेश सरकार ने नदियों के किनारे हो रहे भवन निर्माण पर रोक लगा दी है।
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नदियों के किनारे निर्माण पर रोक का कानून पहले से ही है, लेकिन वोट बैंक के लिए शहर की नदियों में बस्तियां बसा दी गईं। बारिश में ऐसी बस्तियां शासन और प्रशासन के लिए परेशानी का सबब तो बनती ही हैं, हजारों लोग आपदा की चपेट में आ जाते हैं।

नदी के बहाव तक बस गई बस्तियां
रायपुर से लेकर दून विश्वविद्यालय तक रिस्पना के दोनों तरफ एक लाख से ज्यादा आबादी बारिश में खतरे की जद में आ जाती है। यही हाल बिंदाल तमसा और नून नदियों का है। इनके किनारे ही नहीं बल्कि नदियों के बहाव तक बस्तियां बस गई हैं। जब यह बस्तियां बसती हैं तो इन्हें रोकने की जहमत नहीं उठाई जाती है।
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बाद में यदि प्रशासन इन्हें हटाने की कोशिश करता है तो राजनीति होने लगती है। तमाम नेता सामने आ जाते हैं जो बस्तियों को हटाने नहीं देते। नेताओं पर आरोप लगता रहता है कि वह वोट बैंक के लिए ऐसी बस्तियों को पहले बसाते हैं और बाद में उन्हें बचाते हैं।

सिकुड़ गई है रिस्पना
सिंचाई और रेवेन्यू रिकॉर्ड में रिस्पना नदी की चौड़ाई 90 मीटर से ज्यादा है। लेकिन आज यह कई स्थानों पर दस मीटर भी नहीं रह गई है। सर्वोच्च न्यायालय की मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देश पर जिला प्रशासन ने 2002-03 में सर्वे कराया तो पता चला कि रिस्पना नदी की 1850 एकड़ जमीन पर लोग काबिज हैं।

बारिश में होती है जानमाल की हानि
कई जगहों पर नदियों में लोग इस तरह बस गए हैं कि नदी को बहने तक के लिए जगह नहीं बची है। बरसात में नदियां जब उफनती हैं तो बस्ती की बस्ती जलमग्न हो जाती है। ऐसे में किसी का सामान बहता है तो किसी का घर। कई बार तो लोगों की जान तक चली जाती है।

नेता लोग देते हैं संरक्षण
नदियों में अवैध तरीके से बसी बस्तियों को नेता लोग ही संरक्षण देते हैं। इस मामले में किसी भी दल का नेता पीछे नहीं रहता। किसी भी प्रकार के चुनाव में नेता ऐसी बस्तियों में आकर इनमें बसे लोगों के अनुकूल वादा करते हैं।

कोई ऐसी बस्तियों को वैध कराने का वादा करता है तो कोई दूसरी जगह बसाने का और बदले में घर एवं जमीन दिलाने का। सियासतदां कई बार कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर नदियों में बसी बस्तियों को वैध कराने की कोशिश भी करते रहे हैं।

नदियों के किनारे बसी बस्तियां
गब्बर सिंह, घासमंडी, नई बस्ती, सुमन नगर, बापूनगर, सोनिया बस्ती, राहुल बस्ती, रिस्पना पुल के पास, बिंदाल पुल के पास, कबाड़ी बस्ती आदि।

सरकार ने नदियों के किनारे नवनिर्माण पर रोक की तैयारी की है। इसका हम समर्थन करते हैं लेकिन नदियों के किनारे जो लोग रह रहे हैं उन्हें केंद्र से चल रही आवासीय योजनाओं के तहत फ्लैट और घर मिलने चाहिए।
- राजकुमार, कांग्रेस विधायक

प्राकृतिक आपदाएं नदियों की धारा रोके जाने पर विकराल रूप ले रही हैं। ऐसे में नदियों में हो रहे कब्जों पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन नदियों के किनारे की पुरानी बस्तियों को हटाया जाता है तो उन्हें रहने के लिए पक्का मकान मिलना चाहिए।
- सूर्यकांत धस्माना, कांग्रेस नेता

नदियों के किनारे बसी बस्तियां खतरनाक हो गई हैं। बारिश में ऐसी बस्तियां डूब जाती हैं और काफी जानमाल का नुकसान होता है। ऐसे में इन्हें यहां से हटा देना चाहिए।
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- गणेश जोशी, विधायक मसूरी
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