देहरादून। पौधारोपण और जूट तकनीक से पहाड़ के खेतों की मिट्टी के सूक्ष्म पौष्टिक तत्वों को बारिश में बहने से बचाया जा सकता है। इस तकनीक में जूट की चटाई बिछाई जाती है और पौधारोपण किया जाता है। इससे भूस्खलन नहीं होता, न ही मिट्टी बहती है।
केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान ने यह तरकीब निकाली है। हालांकि इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं हो सकता, लेकिन छोटे स्तर पर नुकसान रोकने में यह विधि कारगर है। इससे छोटे खेतों को खत्म होने से बचाया जा सकेगा। सीधी ढलान की सड़कें भी उखड़ नहीं पाएंगी। आपदाग्रस्त क्षेत्रों का सर्वे पूरा होने के बाद सरकार को इस विधि को अपनाने के लिए सुझाव दिया जाएगा।
पहाड़ों पर जलप्रलय के बाद संस्थान की चार टीमें अलग-अलग स्थानों पर स्थिति का आकलन कर रही हैं। संस्थान के प्रमुख विज्ञानी डा. जीपी जुयाल का कहना है कि नई तकनीक का सहस्रधारा समेत कई स्थानों पर परीक्षण किया गया था। जिसमें यह विधि सफल रही है। इस तकनीक को उन पहाड़ी क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है जहां भूस्खलन से खेतों और सड़कों के वजूद के खत्म होने का खतरा बना रहता है।
डा. जुयाल ने बताया कि इस विधि का इस्तेमाल चुनिंदा स्थानों पर होता है। इससे बाढ़ में खेत बहने से बच जाते हैं। खेतों की अधिक कटान नहीं होती। पहाड़ी नालों के लिए चेक डैम बना दिए जाते हैं। चटाई के लिए जूट और नारियल के रेशों का प्रयोग किया जाता है। इस तरह की विशेष चटाइयां कोलकाता की फैक्टरियां बना रही हैं। प्रयोग के तौर पर सहस्रधारा और सभावाला क्षेत्र में विधि अपनाई गई थी। वहां प्रयोग सफल रहा है। इन क्षेत्रों में बारिश के दौरान प्रति हेक्टेयर भूमि से औसत 550 टन मिट्टी बह जाती थी। इस विधि के अपनाए जाने के बाद चार-पांच टन ही मिट्टी बही है, जबकि प्राकृतिक तौर पर प्रति हेक्टेयर भूमि 10 टन मिट्टी बहती है।