देहरादून। पति की करतूत में किसी तरह की भूमिका न होने के बावजूद आगरा निवासी महिला अंजू को 15 साल का अरसा धोखाधड़ी का मुलजिम बनकर गुजारना पड़ा। सुकून की बात यही है कि बृहस्पतिवार पंद्रह साल बाद उसे न्याय मिल गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राजीव कुमार की अदालत ने अंजू को दोषमुक्त करार दिया है। अदालत ने कहा कि अंजू की मामले में कोई भूमिका नहीं थी। उसे सिर्फ अभियुक्त रवीश गाबा की पत्नी होने और उसके द्वारा अनुबंध में उल्लिखत संपत्ति के विक्रय के आधार पर अभियुक्त बनाया गया। उसके खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र का कोई साक्ष्य नहीं है।
मूल रूप से कमला नगर थाना न्यू आगरा जिला आगरा निवासी अंजू के पति रवीश गाबा पर आरोप है कि उसने दून में अलकनंदा लीजिंग एंड फाइनेंस लिमिटेड 23 चकराता रोड से कंपनी के विजय भूषण पांडेय के साथ अनुबंध कर छह लाख 84 हजार 350 रुपये लिए। उस दौरान ये ईसी रोड में रहते थे। अनुबंध में रवीश और उसके भाई विक्रम ने तय किया कि कंपनी से ली गई धनराशि की अदायगी न होेने तक वे अपनी दुकान नंबर 221 व 222 नीलकंठ शॉपिंग कॉम्पलेक्स राजपुर रोड को किसी अन्य को नहीं बेचेंगे न ही बंधक रखेंगे। इस बीच रवीश ने विजय भूषण से ली धनराशि लौटाने के लिए उसे सात लाख पांच हजार रुपये का चेक दिया, लेकिन चेक बाउंस हो गया। पुलिस ने इस मामले में जांच कर विक्रम, रवीश गाबा और उसकी पत्नी अंजू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। कोतवाली सदर में इस मामले में 24 सितंबर वर्ष 1998 में रिपोर्ट दर्ज की गई। मामले में अंजू की भूमिका केवल यह थी कि जिन दुकानों को अभियुक्त रवीश गाबा और विक्रम गाबा ने अनुबंध में किसी और को न बेचने की बात कही थी उन दुकानों को अंजू ने खरीदा था। अंजू ने यह दुकानें अपने पति रवीश से सीधे नहीं बल्कि केपी फाइनेंस के डायरेक्टर केपी कोचर के माध्यम से दो लाख 85 हजार रुपये देकर खरीदी थी। अदालत में सुनवाई के दौरान यह मामला भी सामने आया कि अंजू का रवीश से 2003 में तलाक हो चुका है। बचाव पक्ष (अंजू) के अधिवक्ता ने कहा कि अंजू पर जो मामला बनता ही नहीं उसके लिए उसे अपने ऊपर धोखाधड़ी के आरोपों को लेकर न्याय के लिए पिछले पंद्रह साल से न्यायालय के चक्कर लगाने पड़े। अधिवक्ता ने बताया कि रवीश घटना के बाद से फरार है।