केदारघाटी में जलप्रलय के बाद बचे तमाम लोगों की जान सरकारी हीलाहवाली के कारण चली गई। इन्हीं में शामिल है भानियावाला का कुकरेती परिवार। आपदा में भाभी और दो बच्चों को खोने के बाद घर पहुंचे परिजनों ने रो-रोकर आपबीती सुनाई तो सरकार के आपदा प्रबंधन की भी पोल खोलकर रख दी।
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कानरवाला, भानियावाला के जितेंद्र मोहन कुकरेती अपनी पत्नी, भाभी, पुत्र-पुत्री और एक पड़ोसी के साथ 12 जून को चारधाम यात्रा पर निकले थे। वह 15 जून को गौरीकुंड पहुंचे। परिवार ने 16 जून को यहीं पर विश्राम किया।
लेकिन इसी दिन लगातार जारी बरसात के कारण क्षेत्र में भूस्खलन और जलभराव की स्थिति पैदा होने पर सभी ने गौरीगांव में शरण ली, जिससे जलप्रलय में तो यह परिवार सुरक्षित बच गया।
जलस्तर बढ़ने की आश्ांका
इसके बाद 19 जून तक ये लोग रेस्क्यू के इंतजार में सोनगंगा के किनारे बैठे रहे। लेकिन यहां से निराश होकर रात में जलस्तर बढ़ने की आशंका में उन्होंने नदी का किनारा छोड़ गौरीकुंड मार्ग पर जाने का फैसला लिया। इस बीच पहाड़ी पर भूस्खलन होने के कारण उनकी भाभी और बेटी इसकी जद में आ गए।
कुकरेती कापुत्र शिखर उन्हें बचाने के लिए आगे बढ़ा तो पहाड़ी से एक बड़ा बोल्डर उसके सिर पर गिर पड़ा, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। पूरी रात वह भी उपचार के अभाव में तड़पता रहा।
20 जून की सुबह आर्मी के हेलीकाप्टर से रेस्क्यू कर उन्हें फाटा लाया गया, लेकिन यहां भी घायल को ट्रीटमेंट नहीं मिल पाया। गुप्तकाशी चिकित्सालय पहुंचने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद वह पुत्र की डेड बाडी के साथ निजी टैक्सी बुक कर वसुकेदार, मयाली, चिरबटिया, घनसाली, टिहरी, चंबा होते हुए 21 जून की सुबह भानियावाला पहुंचे।
आपबीती बयां करते-करते उनकी आंखों से अश्रूधारा निकल पड़ी। खुद को ही दिलासा देते हुए वह कहते हैं कि शायद किस्मत को यही मंजूर था।
अब तक नहीं ली किसी ने सुध
हादसे के पखवाड़ेभर बाद भी किसी सरकारी अधिकारी या फिर राजनेता ने पीड़ित परिवार की सुध नहीं ली है। इससे शासन-प्रशासन और सरकार के आपदा प्रबंधन का अंदाजा लगाया जा सकता है।