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हम लोग जिंदा नहीं बच पाएंगे...

Thu, 20 Jun 2013 01:01 PM IST
ओमप्रकाश तिवारी
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सर, हम लोग बच नहीं पाएंगे। तीन दिन से गौरी गांव में फंसे हैं। खाने के लिए न भोजन मिल रहा है न पीने के लिए पानी। गड्ढे का पानी पीकर जान बचा रहे हैं। रात में बारिश होती है तो ठंड बढ़ जाती है। जो भीगता है बीमार हो जाता है और दवा नहीं मिलने से मर जाता है।
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आंखों के सामने मर रहे लोग
आंखों के सामने लोग मर रहे हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली के 14 लोगों के एक दल में से अब केवल एक लड़का बचा है। उसकी भी तबीयत ठीक नहीं है। हर रोज पांच छह लोग मर रहे हैं। जहां-तहां शव बिखरे हैं। हमारा सारा सामान बह गया है। तन पर केवल एक कपड़ा है।

पुलिस और प्रशासन कोई मदद नहीं कर रहा है। इनके रवैये से नहीं लगता कि हम यहां से निकल पाएंगे। ये लोग एक-दो दिन बचाव कार्य चलाकर बंद कर देंगे और हम लोग बारिश में यहीं जिंदा दफन हो जाएंगे।
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बचने की उम्मीद छोड़ दी
यह मार्मिक पुकार है गौरीकुंड से निकलकर गौरी गांव में शरण लिए 5000 से अधिक लोगों की। इनमें से अधिकतर ने बचने की उम्मीद छोड़ दी है। इनमें से एक यात्री ने फोन पर बताया कि शासन और प्रशासन जिस तरह से राहत और बचाव कार्य कर रहा है उससे नहीं लगता कि हम लोग निकल पाएंगे।

प्रशासन को एक हेलीपैड बनाने में दो दिन लग गए। इसके बाद बुधवार को जब हेलीकाप्टर ने उड़ान भरी तो केवल आठ चक्कर लगाए और 40 लोगों को ही ले गए। जो लोग गए उनमें से अधिकतर सिफारिशी थे। इसके बाद हेलीकाप्टर देखकर लोगों में चढ़ने की भगदड़ मच गई तो सेना ने हेलीकाप्टर नहीं उतारा। कहा कि तुम लोग जाना ही नहीं चाहते। पुलिस कप्तान से बात की तो उनका भी यही जवाब था, जबकि सिफारिशी लोगों को खोज-खोजकर ले जा रहे हैं।

यूपी के गोरखपुर जिले के 15 से अधिक लोग रुद्रप्रयाग जिले के गौरी गांव में फंसे हैं। तबाही वाली रात यह लोग गौरी कुंड में थे। कुदरत के कहर के बाद पैदल चलकर गौरी गांव आ गए हैं। बताया कि रास्ते में इन्होंने इतने शव देखे कि गिनती करना भूल गए। अब तो पैदल जाने का भी उपाय नहीं सूझ रहा है।

भयावह तस्वीर सामने आई
इनमें से अधिकतर के पास मोबाइल फोन थे। लेकिन अब आठ-दस हैंडसेट ही काम कर रहे हैं। बाकी की बैटरी खत्म हो चुकी है। बिजली नहीं होने की वजह से मोबाइल चार्ज नहीं हो पा रहे हैं। बीएसएनएल के अलावा और किसी कंपनी का नेटवर्क काम नहीं कर रहा है। जिनके पास बीएसएनएल का नंबर है और बैटरी बची हुई है वही अपनी खोज खबर परिजनों को दे पा रहे हैं। इन्हीं में से एक से अमर उजाला ने बात की तो भयावह तस्वीर सामने आई।

गौरी गांव में शरण लिए लोग भूखे-प्यासे तो हैं ही, रहने की भी जगह नहीं मिल रही है। गांव वालों के पास इतने कमरे नहीं है कि सभी को ठहरने के लिए छत मिल जाए। बहुत सारे लोग खुले में रह रहे हैं। दिन में तो धूप निकलने से किसी तरह काम चल जाता है लेकिन रात में बारिश होती है तो ठंड बढ़ जाती है। बारिश से बचने के लिए लोग घरों के छज्जों के नीचे बैठकर रात गुजार रहे हैं।

हर रोज मर रहे आठ से दस लोग
भीग कर जो बीमार पड़ जा रहा है उसकी मौत हो जा रही है। आठ से दस लोग हर रोज मर रहे हैं। शवों को उठाने की व्यवस्था नहीं है। जल्द ही इन्हें नहीं हटाया गया तो सड़ जाएंगे और महामारी फैल जाएगी। शौच आदि की व्यवस्था नहीं होने से लोग खुले में शौच कर रहे हैं जिससे यहां पर चारों तरफ गंदगी फैलती जा रही है। प्रशासन ने यहां पर खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं की है। बुधवार को हेलीकाप्टर से कुछ खाने-पीने की चीजें और कंबल गिराए गए लेकिन सभी को नहीं मिल पाए। उन्हें पाने वाले कुछ ही भाग्यशाली हैं बाकी भगवान भरोसे हैं।
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