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एवरेस्ट चढ़ीं दून की बेटियां

Mon, 20 May 2013 05:30 AM IST
Dehradun
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देहरादून। दिन: रविवार (19 मई 2013) घड़ी में सुबह के 7:40 बजते ही तिरंगा झंडा दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर फहराने लगा और इसके साथ ही दून की दो बेटियों का नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया। राजधानी की जुड़वां बहनों 21 वर्षीय ताशी मलिक और नुंग्शी मलिक ने पहले इंडो-पाकिस्तान जनरल इक्वेलिटी एंड एक्सपीडिशन मिशन में शामिल होने के बाद यह कामयाबी हासिल कर दून समेत पूरे उत्तराखंड का नाम रोशन कर दिया। अफ्रीका में माउंट किलिमंजारो फतह कर चुकी इन बहनों का 8848 मीटर ऊंचे एवरेस्ट पर चढ़ने का सपना भी इसके साथ पूरा हो गया।
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ताशी और नुंग्शी के पिता रिटायर्ड कर्नल वीरेंद्र सिंह मलिक ने अमर उजाला को बताया कि शनिवार पूरी रात वह सो नहीं सके। एवरेस्ट पर कदम दर कदम बढ़ रही बेटियों की चिंता मन में थी। सुबह 7:40 बजे सेटेलाइट फोन से ताशी-नुंग्शी ने उनके मोबाइल पर फोन किया। बेहद धीमी आवाज में उन्होंने कहा ‘पापा हमने कर दिखाया।’ कर्नल सिंह बताते हैं कि ये शब्द सुनने के साथ ही उनका सर ऊंचा हो गया। मां अंजू थापा मलिक को जब से यह खबर मिली है, मानो पूरी दुनिया की खुशी उनके दामन में समां गई है। मलिक ने बताया कि बेटियों के साथ पाकिस्तानी भाई बहन मिर्जा अली (29) और समीना बेग (22) चार सदस्यीय दल में शामिल थे। समीना एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बताई जा रही है।

ऐसे हुई एवरेस्ट फतह
दल को आठ मार्च (महिला दिवस) को सीएम विजय बहुगुणा ने रवाना किया। चारों पर्वतारोहियों ने नेपाल के पोखरा में दो सप्ताह प्रशिक्षण लिया। इसके बाद दस दिन वे काठमांडू मेें रुके। चार अप्रैल को दल लुकला पहुंचा। यहां से चारों पैदल नामचे बाजार गए। यहीं से ट्रैकिंग की शुरुआत होती है। आठ दिन लगातार ट्रैकिंग के बाद दल एवरेस्ट के बेस कैंप पर 12 अप्रैल को पहुंचा। निकटतम 20 हजार फीट ऊंचे काला पत्थर पर चढ़ने के बाद कैंप प्रारंभ हुआ। 21 हजार फीट पर पहला, 23 हजार पर दूसरा, 25 हजार पर तीसरा और 27 हजार फीट पर चौथा कैंप किया। विशेषज्ञ बताते हैं कि हर दिन चढ़ाई में करीब 8000 कैलोरी खर्च होती है। ऐसे में आराम जरूरी होता है। अंतिम चढ़ाई के लिए दल 16 मई को रात ढाई बजे निकला। 19 मई को एवरेस्ट फतह हुआ। अब दल कैंप 2 सुरक्षित लौट चुका है।
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सताती रही बेटियों की चिंता
ताशी और नुंग्शी के पिता कर्नल वीरेंद्र सिंह मलिक ने वर्ष 2008 में 2/8 गोरखा राइफल से स्वैच्छिक अवकाश ले लिया था। मलिक बताते हैं कि उन्होंने कुपवाड़ा में बिना दहशत दुश्मनों से डटकर लोहा लिया, लेकिन जब से बेटियां पर्वतारोहण अभियान पर गईं हर वक्त उनकी चिंता सताती रहती थी। वह लगातार वेबसाइटों पर एवरेस्ट के मौसम की जानकारी लेते रहे।
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पहाड़ों की दुलारी हैं बेटियां
-अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर जनवरी 2012 में फतह
-एनआईएम उत्तरकाशी से सभी पर्वतारोहण पाठ्यक्रम ए ग्रेड के साथ उत्तीर्ण
-खोज और बचाव अभियान में चयनित
-एडवेंचर और पर्वतारोहण पाठ्यक्रम में प्रशिक्षक के लिए चयनित
-माउंट रुदुगैरा की 20 हजार फीट ऊंचाई पर फतह
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनियरिंग, गुलमर्ग से स्कीइंग कोर्स पास
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