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-सन् 1994 में शुरू हुए धरने के 18 साल पूरे, आज भी कचहरी में जुटती है मातृशक्ति

Thu, 10 Jan 2013 05:30 AM IST
Dehradun
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देहरादून। ये मुट्ठी भर महिलाएं क्या कर लेंगी...?, जुलूसों, धरनों से कुछ नहीं होता जी..., घर का काम नहीं, आंदोलन करने चलीं...। कुछ इसी तरह की बातें उगलती थी लोगों की जुबां, जब मातृशक्त्ति ने 1994 में सड़कों पर आकर अपने राज्य के लिए आवाज उठाई। रोज धरने, प्रदर्शन, जुलूस होते। अत्याचारी पुलिस की लाठियां भी मातृशक्ति के जज्बे को तोड़ नहीं पाई। अंतत: 2000 में राज्य मिलने के साथ ही अपनी सरकार का सपना पूरा हुआ। आंदोलन को तिलांजलि मिली, लेकिन मातृशक्ति के संघर्ष को नहीं। अभी राज्यवासियों के हक की लड़ाई बाकी थी, लिहाजा कचहरी परिसर में 1994 में राज्य प्राप्ति के लिए शुरू हुआ धरना राज्य मिलने के बाद हक की लड़ाई में तब्दील हो गया। नौ जनवरी बुधवार को इस संघर्ष ने 18 साल पूरे कर लिए । इस लंबे सफर में एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई। संघर्ष की राह में कई साथी बिछड़ीं, लेकिन लगभग दो दर्जन जोड़ी पांव आज भी हम कदम हैं। जज्बों में बुलंदी इतनी कि सालों की गिनती नहीं करना चाहतीं। आंखों में गर सपने पूरे न हो पाने की कसक है तो दिलों में उम्मीद की लौ भी। 75 से अधिक बसंत देख चुकीं सरदी नेगी आंखों में पानी भर कहती हैं-कभी परिवार की, बच्चों की नहीं सोची। अपने लोग, अपने राज्य की बात की। आज अपनी सरकार है। सोचा नहीं था, कभी अपनों से भी लड़ना होगा। इंसाफ मिलने तक लड़ेंगे.....।
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1996 में मरी नेता पर धरना हुआ
पांच मई, 1996 को उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अग्रणी नेता कौशल्या डबराल (इन्हीं के नाम पर संघर्ष वाहिनी बनी है ) की मृत्यु हो गई, लेकिन धरना उस दिन भी चला। सुशीला ध्यानी के बकौल हर किसी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उसके बाद नारेबाजी, प्रदर्शन शुरू कर दिया। मकसद लड़ाई आगे बढ़ाना था।

भूख हड़ताल पर जेल, फिर धरना
राज्य आंदोलन चरम पर था। रोज धरना तो चल ही रहा था। आंदोलनकारियों ने भूख हड़ताल का फैसला किया और हम भी शामिल हो गए। अजबपुर खुर्द निवासी लक्ष्मी कैंतुरा के अनुसार पांच दिन की भूख हड़ताल के बाद जेल में ठूंस दिए गए। जब छूटे तो घर नहीं गए, सीधे धरना स्थल पर धरना शुरू कर दिया।
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बच्चों ने कर दी थी भूख हड़ताल
अपना राज्य पाने का अहसास इस कदर भीतर समाया था कि कई बार बच्चों को घर में बंद करके धरने के लिए चले आते थे। कई बार ऐसा हुआ, जब बच्चों को वक्त से खाना भी नहीं दे सके। बकौल सरदी नेगी बच्चों ने भी इस दौरान भूख हड़ताल कर दी। बच्चे एक साथी महिला के थे। कहा, आप धरना दो, हमें खाना नहीं चाहिए।


धैर्य की मिसाल :
विशेश्वरी पंत, सुशीला ध्यानी, जयंती नौडियाल, पार्वती डोभाल, शाखा नौडियाल, लक्ष्मी सकलानी, पीतांबरी रणाकोटी, बुंद्रा नेगी, सरदी नेगी, लक्ष्मी कैंतुरा, उषा सकलानी, महेश्वरी देवी

आंखों को इंतजार :
राजधानी गैरसैण, भले ग्रीष्मकालीन
आंदोलनकारियों को सम्मान पेंशन
मूल निवास को 1950 की ही कट आफ डेट
रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को सजा
इस कांड पर सरकार की मजबूत पैरवी
उत्तराखंड हो नशा, भ्रष्टाचार मुक्त
जल-जंगल-जमीन पर जनता का अधिकार
युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
सत्ता का केंद्र ग्राम सभा को बनाया जाए
हर स्तर पर निर्णय में महिला की भागीदारी

इनका रह गया बस निशां :
कौशल्या डबराल
राजेश्वरी भट्ट
सावित्री काला

महिला मंच ने मनाया धरने का स्थापना दिवस
उत्तराखंड महिला मंच ने कचहरी परिसर स्थित मातृशक्ति स्थल पर महिला मंच के धरने का 18वां स्थापना दिवस मनाया। यह धरना हर स्तर पर निर्णय में महिलाओं की समान भागीदारी के मुद्दे पर सात दिवसीय अनशन के रूप में शुरू हुआ था, जो बाद में उत्तराखंड के जनमुद्दाें को लेकर अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया। इस अवसर पर कमला पंत, हेमलता नेगी, सीमा डोभाल, सावित्री भट्ट, संगीता, फूल देवी, कला नेगी, वीरा, लक्ष्मी नेगी, जमना नेगी, वीना चंदू, रुकमणी चौहान आदि उपस्थित रहीं।
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