देहरादून। सूचना का अधिकार अधिनियम यानी आरटीआई एक्ट को आम आदमी के लिए हथियार कहा गया। सूचना आयोग ने कई मामलों में जुर्माना लगा आम आदमी को इंसाफ दिलाने का काम भी किया। लेकिन अब नियमावली के जरिए इस पर अंकुश लगाने की तैयारी है। जुर्माना लगने पर पावती के अतिरिक्त किसी और कार्रवाई से आयोग को अलग किया गया है, साथ ही आयोग के समक्ष लोक सूचना अधिकारी और विभागीय अपीलीय अधिकारी के अलावा अन्य किसी अधिकारी को सुनवाई में न बुलाए जाने की भी सिफारिश की गई है। नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है, लेकिन शहर के आरटीआई एक्टिविस्ट नियमावली के हक में नहीं। उनकी मानें तो यह एक्ट की धार को कुंद करने की साजिश है। पारदर्शिता नष्ट करने की इस कोशिश के खिलाफ शनिवार को सुबह साढ़े 11 बजे इंदर रोड पर आरटीआई क्लब की बैठक भी बुलाई गई है।
यह हैं विरोध के बिंदु :
-लोक सूचना अधिकारी और विभागीय अपीलीय अधिकारी के अलावा अन्य अधिकारियों को सुनवाई से छूट क्यों?
-अगर वह नहीं आएंगे तो संबंधित विभागों से जुड़े अधिकारियों के पक्ष कैसे रखे जाएंगे?
-जनहित की कई सूचनाएं ऐसी हैं, जिससे किसी व्यक्ति की निजता में अंतर पड़ता है, वह कैसे ली जा सकेंगी?
-लोक सूचना अधिकारी का कार्य सूचना देना है। सीधे से इस कार्य में दबाव कैसा?
-सूचना को रजिस्टर्ड डाक से देने की बाध्यता समाप्त की गई है। ऐसे में सूचना आवेदक के पास पहुंच गई, इसकी गारंटी कौन देगा?
इनका है कहना :
जिस तरह शासन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत की गई व्यवस्थाओं को नियमावली के जरिए परिभाषित करने की कोशिश की है, वह अपने आप में सवाल खड़े करती है। आरटीआई के लिए शुल्क बढ़ाने, कर्मचारियों की नियुक्ति किए जाने जैसे मुद्दों पर फैसला ऐसे कहां होता है?
--एमएस धुंता, महासचिव, आरटीआई क्लब।
लोक सूचना अधिकारी बार-बार अपने ऊपर दबाव की बात दोहराते हैं। आखिर उन पर कौन सा दबाव है? उन्हें केवल मांगी गई सूचना को उपलब्ध ही तो कराना है। असल बात यह है कि उन्हें सूचना के लिए फाइलें पढ़नी पड़ रही हैं। काम करना पड़ रहा है, जो उन्हें मंजूर नहीं।
--एसपी डोभाल, आरटीआई एक्टिविस्ट