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खेती की जमीनों पर हो रहा कालोनियों का विकास

Sun, 11 Nov 2012 12:00 PM IST
Dehradun
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देहरादून। राज्य गठन के साथ दून को अस्थायी राजधानी घोषित किया गया तो आबादी के लगातार बढ़ते दबाव से खुला-खुला नजर आने वाला यह शहर संकरा होने लगा। बहुमंजिला भवन बने, सड़कें सिकुड़ीं और खेती की जमीन गायब होने लगी तो विकास के नए मानकों की जरूरत भी महसूस हुई। इसके लिए बात उठी राजधानी के मास्टर प्लान की, जिसे नीति नियंताओं ने नाम दिया ‘महायोजना’। लेकिन 12 वर्ष बाद भी इसे लागू करने को लेकर शासन-सरकार में माथापच्ची जारी है। उलझनें इस कदर हैं कि अब तक महायोजना का स्वरूप ही फाइनल नहीं हो सका है। इस बीच शहर में अवैध निर्माणों की बाढ़ नियोजित विकास के दावों पर सवाल उठा रही है।
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होना तो यह था कि वर्ष 2001 में ही राजधानी का मास्टर प्लान लागू हो जाता, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसकी ‘एक्सरसाइज’ में ही पांच साल बिता दिए। भाजपा सरकार ने नवंबर 2008 में इसे लागू तो किया, लेकिन प्लान में ‘छेद’ इतने थे कि मरम्मत करना मुश्किल हो गया। जाते-जाते भाजपा ने संशोधित प्लान जारी किया। आपत्तियां मांगी गईं, तो छह सौ से अधिक लोगों ने प्लान पर सवाल खड़े किए। अब फिर कांग्रेस सत्तासीन है, लेकिन इन आपत्तियों के निस्तारण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। नतीजा, शहर में तेजी से अवैध और संकरी कालोनियां विकसित हो रही हैं।

मानक 2001 2012
शहर की आबादी 5.0 लाख 8.0 लाख
शहर में वाहनों की संख्या 1.75 लाख 5.30 लाख
शहरी क्षेत्रफल 65 वर्ग किलोमीटर 90 वर्ग किलोमीटर

ग्रेटर दून में 50 करोड़ का नुकसान
ग्रेटर दून बनाने के लिए प्रदेश की पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार ने राजधानी के आसपास के गांवों में छह सौ हेक्टेअर भूमि का अधिग्रहण किया था। इस योजना के लिए एमडीडीए ने हडको से ऋण भी ले लिया था, लेकिन वर्ष 2007 में भाजपा सरकार ने बासमती की खेती के नाम पर अधिग्रहीत जमीन किसानों को लौटा दी। इससे एमडीडीए को करीब 50 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा सरकार का यह फैसला आज राजधानी पर भारी पड़ रहा है। एक ओर शहर में अनियोजित विकास परेशान कर रहा है, वहीं किसानों को लौटाई गई जमीनों पर भी कालोनियां बस चुकी हैं।
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