लोग रह रह कर सचिन तेंदुलकर को ही नहीं निहार रहे थे, उनकी नजर स्टेडियम के ए ब्लाक के उस जगह पर भी जाती थी, जहां उनका एक खास प्रशंसक सुधीर गौतम अपने झंडे और शंख के साथ नौजूद था।
सचिन के हर चौके छक्के और किसी मास्टर स्ट्रोक पर शंखनाद की ध्वनि और लहराते तिरंगे को लोगों के कुछ नया नहीं, पर वह भी अब इसलिए खास है कि उनके गुरु और ग्रेट की विदाई नजदीक आ रही है।
ऐसा ही पूरे दिन भर के नजारे को देखने के लिए, स्टेडियम में दूसरे क्रिकेट प्रेमी गौतम से क्या बातें करते हैं, उसका क्या जवाब होता है, वह भी किस अंदाज में अपने ऑटोग्रॉफ देते हैं।
अंपायर के किसी निर्णय पर उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है, सचिन को खेलते हुए देख कर वह किस तरह भाव प्रदर्शित करते हैं, यह सब जानने के लिए ए ब्लाक में पूरे दिन रहकर इसे देखा।
'क्या जवाब दूं'
मैदान में पहली गेंद फेंके जाने से पहले उसने अपनी जगह निश्चित कर ली थी। शरीर पर पेंट से तेंदुलकर लिखकर साथ में साफ-सुथरा झंडा लेकर आया था। सजीला शंख भी उनके पास था।
उनसे हर गुजरने वाला शायद यही पूछना चाहता था, गौतम भाई, सचिन आखिरी रणजी खेल रहे हैं। क्रिकेट से अब विदा हो जाएंगे, कैसा लग रहा है, उसका पलट कर जवाब होता है, बताइए क्या जवाब दूं इसका, ये कहूं कि अच्छा लग रहा है, हमारे ग्रेट सर अब नहीं खेलेंगे।
भई, सचिन हमारे गुरु हैं। उन्हें हम हमेशा मिस करेंगे। तो दूसरा सवाल यही कि क्या अब भी वह हमेशा की तरह स्टेडियम में आएंगे। उसका जवाब, क्यों नहीं आएंगे। पर अब हम अपने बदन पर लिखेंगे, सचिन सर आपको मिस करते हैं।
मुंबई का ही पक्ष क्यों
खेल अपने रंग में आने लगा। हरियाणा की बल्लेवाजी का पतझड़ शुरू हुआ। उधर, विकेट गिरता तो इधर, गौतम शंख बजाते। आखिर मुंबई की सफलता है। और मुंबई यानी उनके ग्रेट सर की टीम।
मैंने पूछा, "आप तो क्रिकेट के फैन है। फिर पक्षपात क्यों करते हैं। हमेशा मुंबई का पक्ष क्यों लेते हैं।" उसका जवाब था, 'भई आप कल्पना कर सकते हैं कि सचिन सर के रहते हम किसी दूसरी टीम का साथ दें। और कल सचिन क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे तब? तब की तब देखी जाएगी।'
लंच से थोड़ा पहले उनके पास बच्चे ऑटोग्रॉफ लेने आते हैं। वह किसी को निराश नहीं करते। केवल हस्ताक्षर ही नहीं करते कुछ लिखते भी हैं।
लड़कियों को दिया ऑटोग्रॉफ
कुछ कॉलेज की लड़कियां, शायद दिल्ली से मैच देखने आईं है, वो उसके साथ फोटो खिंचवाती हैं। फोटो खींचती रही मगर उनकी निगाह मैदान पर ही होती है। क्या मजाल कोई उसके सामने से आ जाए।
सुधीर तुनक कर कह देते हैं, "हम नहीं खिंचवाएंगे फोटो, हमें मैच देखने दो। सामने से हटिए। हां यह भी देखा कि एक दो बार फील्डिंग करते सचिन ने अपने साथी के लिए हाथ भी हिलाया। मगर दूसरे के लिए सचिन का हाथ हिलाना कोई बड़ी बात हो, उसके लिए तो यह आए दिन की बात होगी। सचिन के हाथ हिलाने पर उसमें कोई चपलता नहीं।"
"कह देता है, अरे हमें ही देख रहे हैं सर। उन्हें पता है हम यहां बैठे हैं।"
मुंबई टीम के साथ किया लंच!
लंच हुआ तो वह तेजी से लपक कर कहीं चला गया। किसी ने बताया कि वह मुंबई टीम से मिलने गया है। लंच भी शायद वहीं करेंगे।
हरियाणा की पारी सस्ते में निपट गई। लोगों को इस बात का रोमांच था कि सचिन की बल्लेवाजी जरूर देखने को मिलेगी। शुरू में वो उदास हुआ। मुंबई के रन भी नहीं बन रहे थे।
देखिए ना कितना समय हो गया कोई चौका नहीं लगा। आखिर वो समय भी आया। सचिन तेंदुलकर बल्लेवाजी करने आए।
पूरा स्टेडियम मास्टर बैस्टमैन के स्वागत में खड़ा हो गया। इस बार शंखनाद पांच मिनट का। हर कोई रोमांचित था। उसके सर ने शुरू में एक शानदार चौका भी लगाया तो वह आसपास के लोगों से बोला, देख लीजिए, शोर ना कीजिए। यह अवसर फिर नहीं आएगा। खेल देखिए।
मगर यह क्या, एक उठती गेंद सर को झांसा देकर कोहनी से लगती हुई स्टंप पर जा लगी। गिल्लियां बिखर गई। मास्टर बल्लेवाज वापस पवेलियन आ रहे थे।
गौतम शोक में डूब गए। उन्होंने झंडे के पीछे अपना सिर छिपा। कुछ लोग उनसे मजाक करने लगे। अरे सचिन बेचारा तो जल्दी आउट हो गया। वह चुप थे। किसी की बात का जवाब नहीं दिया। कुछ युवतियां आईं। फोटो खिंचवाना चाहती थीं। उन्होंने कहा थोडा़ हमको नॉर्मल होने दीजिए। देखो सर वापस लौट गए हैं।
वह गहरे दुख में था। लेकिन अगर कोई चौका लगता तो झंडा लहराना और शंख बजाना वह नहीं भूला।