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11 साल की उम्र में उठा मां का साया, पिता ने पेट काटकर पाला, अब बेटा बना वर्ल्ड कप में भारत का कप्तान

Tue, 03 Dec 2019 06:10 PM IST
मुकेश कुमार झा स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
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प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
कहते हैं कि सच हो जाते हैं सारे सपने, अगर हिम्मत देने वाला साथ हो...कुछ ऐसा ही प्रियम गर्ग के पिता नरेश गर्ग के साथ हुआ। जी हां, नरेश गर्ग ने अपने बेटे प्रियम को क्रिकेटर बनाने का सपना देखा था, जो अब जाकर साकार हुआ। प्रियम को वर्ल्डकप में भारतीय अंडर-19 टीम की कमान सौंपी गई है, जिससे उनके पिता नरेश गर्ग का सीना गर्व से चौड़ा है। मगर इसके पीछे की जो कहानी है वो वाकई भावुक कर देने वाली और हर किसी के लिए प्रेरणादायक हो सकती है। आइए जानते हैं फर्श से अर्श तक का सफर तय करने वाले प्रियम गर्ग की कहानी...
 
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प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
मूल रूप से मेरठ के रहने वाले प्रियम गर्ग महज आठ साल की उम्र से ही क्रिकेट खेलने लगे थे। कुछ लोगों ने प्रियम की प्रतिभा को देख उनके पिता को क्रिकेट एकेडमी ज्वाइन कराने का सलाह दिया। मगर उनकी आर्थिक स्थिति सामान्य थी, न ही कोई मजबूत सोर्स था। जिससे वह अपने बेटे का एडमिशन मेरठ में करा सकें।
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राहुल द्रविड़ के साथ प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
हालांकि, किसी भी तरह प्रियम का एडमिशन संजय रस्तोगी की एकेडमी में एडमिशन हो गया। मेरठ में एकेडमी ज्वाइन कराने के बाद प्रियम के पिता ने अपने बेटे को अच्छा क्रिकेटर बनाने के लिए दिन रात एक कर दी। प्रतिदिन किला परीक्षितगढ़ से मेरठ भेजने और उसको वापस लाने की जिम्मेदारी भी बड़ी थी। कई बार साधनों की कमी के चलते साइकिल से भी मेरठ आना पड़ता था। क्योंकि प्रियम के घर से एकेडमी 20 किलोमीटर की दूरी पर था।

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राहुल द्रविड़ के साथ प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
'पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब' वाला यह कहावत तो आपने सुना ही होगा। कुछ ऐसा ही प्रियम के साथ हुआ। पिता नरेश को छोड़कर परिवार के लोग प्रियम से बेहद नाराज रहते थे। प्रियम की मां कुसुम देवी भी समझाती थी कि खेल-कूद में कुछ नहीं रखा है। मगर प्रियम के अंदर क्रिकेटर बनने का जुनून जो सवार था।
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प्रियम गर्ग - फोटो : social media
इसके कुछ दिनों बाद प्रियम की मां कुसुम देवी की मृत्यु हो गई। साल 2011 जब प्रियम की मां की मृत्यु हुई, उस समय प्रियम की उम्र मात्र 11 साल थी। मां की मौत के बाद पिता नरेश ने प्रियम का हौसला नहीं टूटने दिया। हालांकि, मां की मौत के दौरान उसने एकेडमी जाना छोड़ दिया था, लेकिन कुछ दिनों बाद पिता ने उसको फिर से एकेडमी भेजना शुरू किया।
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प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
कप्तान बनने के बाद प्रियम में इंटरव्यू में बताया, 'पापा दूध बेचते थे और रात में मुझे 10 रुपये इसलिए देते थे, जिससे मैं मेरठ जाकर क्रिकेट की प्रैक्टिस कर सकूं। मेरे लिए पापा ने दूध बेचा, स्कूल की गाड़ी चलाई..क्या कुछ नहीं किया। उस समय हालात उतनी अच्छी नहीं थी कि बस की सीट पर बैठकर सफर कर सकूं। इसलिए बस की छट पर बैठकर एकेडमी जाता था। उस दौरान अक्सर सोचता रहता था कि एक दिन खूब पैसा कमाऊंगा और पापा की मदद करूंगा।
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प्रियम के पिता नरेश गर्ग, दो बड़ी बहनें और भाई शिवम - फोटो : अमर उजाला
वहीं, प्रियम के पापा नरेश गर्ग का कहना है कि बेटा प्रियम वर्ल्ड कप लाए तो चौड़ा होगा सीना। पिता नरेश गर्ग ने कहा कि बेटे को टीम की कप्तानी मिली है यह अच्छी बात है। अब अंडर-19 वर्ल्ड कप में देश को दिलाए खिताब तो सीना चौड़ा होगा।
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प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला
बता दें कि पिता नरेश गर्ग वर्तमान में स्वास्थ विभाग में गाड़ी चालक हैं, दूध का काम छोड़कर वह गाड़ी चलाकर अपना घर चला रहे हैं। हालांकि, घर का स्थिती में अब काफी सुधार हुआ है। रणजी मैचों में खिलाड़ी बेटे का सलेक्शन होने के बाद बेटे को अच्छी रकम मिलती है, जिससे घर के हालात अब पहले से बेहतर हो गए हैं। बता दें कि पिछले साल प्रियम गर्ग ने अपनी पहली रणजी ट्रॉफी में खेलते हुए एक दोहरा शतक, दो शतक और पांच अर्धशतक की मदद से 867 रन बनाए थे।
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