मशहूर पुर्तगाली कवि और लेखक फर्नांडो पेसोआ अपनी पुस्तक 'द बुक ऑफ डिसक्वाइट' में लिखते हैं, 'मैं उन सभी लड़ाइयों के घावों को सहन करने के लिए मजबूर हूं, जो मैंने कभी टाल दी थीं।' इन पंक्तियों में छिपा मनोविज्ञान क्रिकेट विश्वकप 2023 में स्वप्न-सरीखा प्रदर्शन कर रहे मोहम्मद शमी की जिंदगी से झलकता है, जिसमें उन्हें कई इम्तिहानों से गुजरना पड़ा। कामयाबी की कहानियां क्रिकेट जगत के लिए नई नहीं हैं, जहां रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं। लेकिन कुछ कहानियां भारत के दिग्गज तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की तरह होती हैं, जो दृढ़ता और प्रतिबद्धता की जीती-जागती मिसाल होती हैं। विश्वकप में अपनी टीम की कामयाबी का आधार बने मोहम्मद शमी के प्रदर्शन का हम जश्न मना रहे हैं, लेकिन उन्हें मोहम्मद शमी बनाने वाली चुनौतियों को जानना भी उतना ही जरूरी है।
पिता का ख्वाब
चलिए, कुछ दशक पहले के उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले चलते हैं, जहां एक क्रिकेट प्रेमी तौसीफ खान ने, जो खुद कभी राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में खेलने का ख्वाब देखते थे, अपने बेटे मोहम्मद शमी को क्रिकेटर बनाने की ठानी। जब शमी 15 साल के हुए, तब तौसीफ उन्हें आगे के प्रशिक्षण के लिए मुरादाबाद में कोच बदरुद्दीन के पास ले गए। लेकिन जब बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद उत्तर प्रदेश की अंडर-19 क्रिकेट टीम में नहीं चुना गया, तो उन्हें बड़ी निराशा हुई. लेकिन कहते हैं न कि प्रतिभा के तूफान को कोई रोक नहीं सकता। किस्मत ने दरवाजा तब खटखटाया, जब कोच बदरुद्दीन के पास कोलकाता के एक क्लब से फोन आया कि उन्हें एक तेज गेंदबाज की तलाश है। बस यहीं से युवा शमी की किस्मत ने नया मोड़ लिया और अब वह भारतीय गेंदबाजी की रीढ़ बन गए हैं। लेकिन यहां तक की अपनी यात्रा में उन्होंने काफी कुछ झेला है। जीवनसाथी के आरोप, तलाक, आत्मघाती अवसाद, सोशल मीडिया ट्रोल्स इत्यादि सभी कुछ एक ऐसे व्यक्ति पर थोपी गईं, जो खुद उनसे बचना चाहता था।
विकेट लेने के बाद मोहम्मद शमी
- फोटो : सोशल मीडिया
कोच का साथ मिला
उनकी सफलता में सिर्फ उनकी कड़ी मेहनत नहीं है, बल्कि उनके साथ-साथ उनके कोच बदरुद्दीन का भी बड़ा योगदान है। 13-14 साल की उम्र में शमी रोजाना अमरोहा से 25 किलोमीटर दूर मुरादाबाद के सोनकपुर स्टेडियम में बदरुद्दीन से कोचिंग लेने आते थे, यहीं से उन्हें अपनी किस्मत और पंख मिले। जब शमी पहली बार अपने कोच बदरुद्दीन से मिले, तो उन्होंने शमी को करीब 30 मिनट तक गेंदबाजी कराई। खेल के पहले मिनट में उन्होंने जो गेंद फेंकी थी और 30वें मिनट में जो गेंद फेंकी थी। उन्होंने 30वें मिनट में उसी जोश के साथ गेंद फेंकी जैसे पहली गेंद फेंकी थी। तभी से उनके जुनून का पता चल गया।
कलाई का इस्तेमाल
शमी की गेंदबाजी की खासियत तेजी के साथ उनकी हर गेंद को सीम को ऊपर रखते हुए फेंकने की काबिलियत है। लेकिन किसी गेंदबाज के लिए यह आसान नहीं होता। कड़े अभ्यास से उन्होंने इस कला में महारत हासिल कर ली है। गेंदबाजी करते वक्त शमी जिस तरह अपनी कलाई को ड्रिल करते हैं, वह उभरते हुए तेज गेंदबाजों के लिए प्रेरणा है। उनकी एक और खासियत यह है कि वह अगर एक घंटे गेंदबाजी करेंगे, तो उनकी गति में कमी नहीं आती। उनके कंधों की ताकत और उनका स्टेमिना विश्व के कम ही खिलाड़ियों में दिखता है। -कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी
मोहम्मद शमी
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आत्महत्या का विचार
2015 के विश्वकप के बाद शमी चोट से वापसी कर रहे थे। उनकी निजी जिंदगी में काफी कुछ ऐसा चल रहा था, जिससे वह परेशान थे। वह खुद बताते हैं कि उन्होंने तीन बार आत्महत्या करने की सोची थी। 2015 में चोट से वापसी करने में उन्हें 18 महीने लगे। वह टीम में वापस आने की पूरी कोशिश कर रहे थे। लेकिन आईपीएल से 10-12 दिन पहले ही उनका एक्सीडेंट हो गया। उनका घर 24वीं मंजिल पर था और वह इतने हताश थे कि उनके घर वालों को लगता था कि कहीं वे आत्महत्या न कर लें। इसलिए परिवार का कोई न कोई सदस्य हमेशा उनके साथ रहता था। परिवार का यही साथ उनकी ताकत थी।
22 जून 2019, साउथेम्प्टन
इस दिन को कैसे भूल सकते हैं? 2019 के विश्वकप में भारत अफगानिस्तान के सामने हार की कगार पर था। अंतिम ओवर में अफगानिस्तान को 16 रन बनाने थे, लेकिन शमी ने मैच के अंतिम ओवर में तीन गेंदों पर लगातार तीन विकेट लेकर ऐतिहासिक हैट्रिक लगाई और भारत को जीत दिलाई। शमी के लिए वह दिन महत्वपूर्ण था। एक तरफ वह अपनी निजी जिंदगी में लगातार जूझ रहे थे, तो दूसरी ओर लगातार सफलता के झंडे भी गाढ़ रहे थे। 1987 में चेतन शर्मा के बाद विश्वकप में हैट्रिक लेने वाले वह पहले भारतीय गेंदबाज बने थे। हालांकि चार विकेट लेने के बावजूद शमी को प्लेयर ऑफ द मैच का अवॉर्ड नहीं मिला।
मोहम्मद शमी
- फोटो : सोशल मीडिया
कोरोना काल का फायदा
शुरुआत में यह माना जाता था कि शमी सिर्फ लाल गेंद के गेंदबाज यानी सिर्फ टेस्ट क्रिकेट ही खेल सकते हैं। दरअसल, लाल गेंद ज्यादा स्विंग होती है। जबकि सफेद गेंद शुरुआत के कुछ ओवर ही स्विंग होती है। लेकिन शमी ने कोरोना के समय का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने सफेद गेंद से जमकर अभ्यास किया।
पूरी तरह से शांत
शमी के कोच बदरुद्दीन बताते हैं कि शमी की खासियत है कि जिंदगी में कितनी ही परेशानियां आएं, वह हमेशा शांत बने रहते हैं। उनकी आक्रामकता केवल क्रिकेट के मैदान पर दिखती है। मैदान के बाहर वह बिल्कुल शांत और कम बातचीत करने वाले व्यक्ति हैं।