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मोदी के ‘नए भारत’ को क्या एक नए संसद भवन की आवश्यकता है?

तवलीन सिंह
Updated Mon, 11 Nov 2019 08:44 AM IST
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संसद भवन (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

नरेंद्र मोदी के ‘नए भारत’ को क्या एक नए संसद भवन की आवश्यकता है? हो ना हो, लगता है कि इसके निर्माण की तैयारी शुरू हो गई है। पिछले सप्ताह कुछ अखबारों में एक नक्शा छपा, जिसमें इस नए संसद भवन की जगह वर्तमान संसद से थोड़ी दूर दिखाई गई है। इस नक्शे में विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक पूरी तरह परिवर्तन लाने की भी तैयारियां दिखाई गई हैं। प्रधानमंत्री निवास और प्रधानमंत्री कार्यालय को राजपथ पर साथ-साथ दिखाया गया है और इनके सामने सड़क की दूसरी तरफ इस नक्शे में अन्य सरकारी कार्यालयों की जगहें दिखाई गई हैं। इस नक्शे को देखकर मुझे तो तकलीफ हुई ही, मेरे अलावा दिल्ली के कई अन्य निवासियों ने भी चिंता व्यक्त की है। केवल इसलिए नहीं कि यह नई दिल्ली का सबसे सुंदर हिस्सा है और यहां परिवर्तन लाने की कोई जरूरत ही नहीं है, इसलिए भी कि ऐतिहासिक इमारतों में परिवर्तन लाना खतरे से खाली नहीं है।



इनको सलामत रखना इतना जरूरी माना जाता है कि चीन और पूर्व सोवियत संघ में मार्क्सवादी क्रांति आने के बाद भी उन महलों को नहीं गिराया गया, जहां रूस और चीन के सम्राट रहा करते थे। यही कारण है कि लंदन में आज भी संसद की जगह उसी  वेस्टमिंस्टर पैलेस में है, जहां 12 वीं सदी में पहली संसद बैठी थी। उस महल में दो बार बुरी तरह आग लगी थी, लेकिन दोबारा उसका निर्माण उस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखकर वहीं किया गया था। हमारे संसद भवन का भी ऐतिहासिक घटनाओं के साथ इतना गहरा वास्ता है कि नरेंद्र मोदी खुद जब पहली बार वहां पहुंचे थे, तो उन्होंने लोकसभा के अंदर कदम रखने से पहले लोकतंत्र के इस मंदिर को नमन करते हुए माथा टेका था। सो अब अगर इस इमारत से संसद को हटाकर मोदी सरकार इसको संग्रहालय में परिवर्तित करने का इरादा रखती है, तो समझना मुश्किल है कि वह ऐसा क्यों करना  चाहती है।


एडविन लुटियंस ने जब इस इमारत का निर्माण किया था, तो ओडिशा के 64 योगिनी मंदिर से प्रेरणा ली थी, सो ऐसा भी नहीं है कि हम पर कोई विदेशी इमारत थोपी गई है। सौ वर्ष पुरानी यह इमारत इतनी ऐतिहासिक है कि इसकी मरमत भी बहुत ध्यान से की जाती है, ताकि इसकी खास पहचान में किसी किस्म की खराबी न आए।


मोदी सरकार दिल्ली में परिवर्तन लाना ही चाहती है, तो पहला काम यह होना चाहिए कि जिस तीन मूर्ति भवन में कभी प्रधानमंत्री निवास हुआ करता था, वहीं पर दोबारा प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय बनाना चाहिए। प्रधानमंत्री निवास को नेहरू संग्रहालय बनाकर इंदिरा गांधी ने जो गलती की थी, उसे सुधारने का समय आ गया है। मोदी सरकार परिवर्तन लाना ही चाहती है, तो जिस लुटियंस दिल्ली में हमारे मंत्री राजा-महाराजाओं की तरह रहते हैं, वहां क्यों नहीं लाती है? हमारे जन  प्रतिनिधियों को ऐसे निवासों में रहने का क्या अधिकार है, जिनकी बाजार में कई सौ करोड़ रुपये कीमत है?


इनको सरकारी मकान देने ही हैं, तो इनको राष्ट्रपति भवन के 600 एकड़ जमीन पर क्यों न बसाया जाए? ऐसा करने से उनकी सुरक्षा पर भी कम खर्च होगा और इनके बंगलों को बेचकर सरकार जो पैसा बनाती है, उसको प्रधानमंत्री आवास योजना में निवेश किया जा सकता है। इस तरह के परिवर्तन लाने का वैसे भी समय आ गया है। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा लोकतांत्रिक देश है, जहां गरीब, बेघर जनता का पैसा जनप्रतिनिधियों के शाही मकानों पर खर्च किया जाता है।

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