अयोध्या जो अब तक युद्ध में थी, युद्ध से बाहर आ चुकी है। दोनों पक्ष लड़ते-लड़ते थक गए थे। इसलिए एक फैसले से पांच सौ साल के विवाद का खात्मा हो गया है। अब मंदिर वहीं बनेगा। मस्जिद भी बनेगी। उम्मीद है कि धर्म की राजनीति का अंत होगा। भगवान राम राजनीति से मुक्त होंगे। उन्हें चैन की नींद आएगी। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने अयोध्या के इतिहास और वर्तमान से जुड़े कई अहम पहलू तय कर दिए। राम की जन्मभूमि इतिहास और समाज के पेचीदा चक्रव्यूह से मुक्त हो चुकी है। शीर्ष अदालत ने उन कई सवालों के जवाब दे दिए हैं, जो करीब पांच शताब्दियों से देश और समाज के विभाजन का चक्रव्यूह रच रहे थे। भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अयोध्या से शुरू हुई थी। मंडल के जवाब में कमंडल आया और कामयाब भी रहा। भाजपा दो सीटों से बढ़कर 303 सीटों तक जा पहुंची।
अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को जो कुछ हुआ, वह किसी भी हिंदू परंपरा में मान्य और प्रतिष्ठित नहीं है। पर कोई इसे बूझना भी नहीं चाहता कि इस आक्रोश की जड़ें कहां थीं? 1934 में हिंदुओं की एक विशाल भीड़ ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद तोड़ दिए थे। फैजाबाद के अंग्रेज कलेक्टर ने बाद में इनका पुनर्निर्माण करवाया। तब हिंदू भावनाओं को भड़काने के लिए विश्व हिंदू परिषद अस्तित्व में भी नहीं थी। इससे पहले भी 1855 में अयोध्या में भारी संघर्ष हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 12,000 लोगों ने ढांचे को घेर लिया था। वह संघर्ष खूनी था। 70 मुसलमान मारे गए थे। ढांचे का एक हिस्सा फिर गिरा था। उस वक्त तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म भी नहीं हुआ था। कोई चुनाव भी सामने नहीं था। यानी इन गुंबदों को लेकर आक्रोश हर काल में था। पर किसी ने उसे समझने और सुलझाने की कोशिश नहीं की। अयोध्या राजनीति का हथियार बन गई। इस हथियार का इस्तेमाल कभी कांग्रेस ने किया, तो कभी भाजपा ने। इसी से मिलते-जुलते समझौतों पर पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार, फिर चंद्रशेखर और फिर नरसिंह राव की सरकारें पहुंच चुकी थीं। पर तब की राजनीति को ये समझौते सूट नहीं करते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने तो 42 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर राम जन्मभूमि न्यास को सौंपने का अध्यादेश ही जारी कर दिया था। पर धर्मनिरपेक्षता के दबाव में उन्हें दो ही रोज में अध्यादेश वापस लेना पड़ा। तब से भगवान राम चुनाव की राजनीति में फंसे रहे। अदालत के फैसले से भगवान राम इस राजनीति से भी मुक्त हुए।
इस बीच एक और अजीब घटनाक्रम देखने को मिला। लोग भाजपा से लड़ते-लड़ते राम से लड़ने लगे। कुतर्को की लंबाई यहां तक पहुंच गई कि यह भी पूछा जाने लगा कि राम हुए भी थे या नहीं? शीर्ष अदालत ने इस जमात को भी करारा जवाब दिया। उसने साफ कर दिया कि राम से अयोध्या को अलगाया नहीं जा सकता। अयोध्या की पहचान राम से है। इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। ऐसा पहली बार शीर्ष अदालत ने ही नहीं कहा। इस देश में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के पितामह डॉ. लोहिया ने भी यही कहा था, 'राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है, कृष्ण उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी हैं। मैं जानता हूं, इस देश का मानस गढ़ने में राम, कृष्ण और शिव की भूमिका रही है।... देश के सांस्कृतिक इतिहास में यह निरर्थक बात है, भारतीय पुराण के ये महान लोग धरती पर पैदा हुए भी या नहीं या कहां पैदा हुए। राम हिंदुस्तान की उत्तर-दक्षिण एकता के देवता थे।' लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि लोहिया के चेले यह नहीं समझ पाए और वे आडवाणी से लड़ते-लड़ते राम से लड़ने लगे। अगर वामपंथी मित्रों ने भी लोहिया और गांधी की नजर से राम को देखा होता, तो वे अयोध्या आंदोलन के मर्म को आसानी से समझ लेते।
दरअसल यह पूरा विवाद बदनीयती का था। नीयत साफ होती, तो यह झगड़ा कब का निपट गया होता। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वक्त यह मामला सुलझने ही वाला था। दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आ गए थे। तीन दौर की बैठक हुई। वहां पहले मंदिर था या मस्जिद, इसके दस्तावेजो का आदान-प्रदान हो गया। लगने लगा कि मामला समझौते के करीब है, तो राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी। उन बैठकों में बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि अगर यह सिद्ध हो जाए कि वहां पहले मंदिर था, तो वे अपना दावा खुद छोड़ देंगे। तभी मामले में एक मोड़ आ गया। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष अली मियां नदवी के पिता मौलाना अब्दुल हकीम हई नदवी की एक किताब हिंदुस्तान इस्लामी अहद में अरुण शौरी को मिली। किताब अरबी में थी। अली मियां के पिता इस्लाम और अरबी के बड़े जानकार थे। इस किताब का उर्दू अनुवाद अली मियां ने किया था। किताब में एक अध्याय हिंदुस्तान की मस्जिदों पर था, जो मंदिर तोड़कर बनाई गई थीं। फिर विवाद गहराया। पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष के पिता ने सबूतों के साथ लिखा था। रातोंरात वह किताब इस्लामी लाइब्रेरियों से गायब करा दी गई। पर्सनल लॉ बोर्ड अपने प्रस्ताव से पीछे हट गया। सैयद शहाबुद्दीन भी अपने उस प्रस्ताव से भाग खड़े हुए, जिसमें दावा किया गया था कि अगर यह सिद्ध कर दिया जाए कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम जन्मभूमि पर किया गया था, तो वह स्वयं अपने हाथों से उस मस्जिद को ढहा देंगे। वह बातचीत भी टूट गई।
अयोध्या का मतलब है कि जिसे जीता न जा सके। इस फैसले से साबित भी हुआ कि उसे जीता नहीं जा सकता। इसके साथ ही कुछ जटिल प्रश्न भी हमेशा के लिए हल हो गए। सबसे बड़ी बात यह तय हो गई कि राम की जन्मभूमि वहीं है। उसका बंटवारा नहीं हो सकता। अयोध्या ने मंदिर और मस्जिद, दोनों को स्वीकार किया। सरयू ने माना कि उसका पानी पूजा और वजू, दोनों के लिए है। अब यह जरूरी है कि न खुशी का इजहार हो, न नफरत का मातम। खुराफात खत्म। अब भूख और गुरबत के वाजिब मुद्दे पर आइए। राम की मर्यादा रामराज्य में है और रामराज्य की असली तस्वीर आखिरी आदमी की आंख से आंसू पोछने की ही हो सकती है।
-वरिष्ठ पत्रकार तथा युद्ध में अयोध्या व अयोध्या का चश्मदीद के लेखक।