इंद्र ने देवताओं से पूछा, ‘ऐसी क्या बात है, जो आप सबको एकसाथ हमारे पास आना पड़ा?’
‘देवराज, इतने बड़े संसार में कितने ही ऋषि-मुनि अनेक तरह के यज्ञ और अनुष्ठान आदि करते हैं। प्रत्येक यज्ञ में हमारी संतुष्टि के लिए हविष्य अर्पित किया जाता है। परंतु वह हविष्य हमें पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता। इस कारण हमें संतुष्टि नहीं होती। आप कोई ऐसा प्रबंध कीजिए, जिससे वह संपूर्ण हविष्य हमें प्राप्त हो सके।’
इंद्र ने यह सुना, तो उन्हें आश्चर्य हुआ। इंद्र ने इस पर बहुत देर सोचा, किंतु उन्हें इसका कोई हल समझ नहीं आया। फिर वह बोले, ‘सृष्टि की कुछ समस्याएं ऐसी भी हैं, जिनका समाधान केवल सृष्टि के रचयिता यानी भगवान ब्रह्मा ही कर सकते हैं। चलिए हम सब उन्हीं के पास चलते हैं।’
इंद्र, सभी देवताओं को लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचे और अपनी दुविधा बताई। उसे सुनकर ब्रह्मा मुस्कराए और बोले, ‘मैं आपका कष्ट समझ सकता हूं। यज्ञ में अर्पित हविष्य को देवताओं तक पहुंचाने का कार्य अग्निदेव का है। परंतु अग्निदेव की क्षमता भी सीमित है। वह समस्त शक्ति लगाकर भी हविष्य पूर्ण रूप से नहीं पचा पाते। इसलिए आपको पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होता है।’
‘तो क्या हमें पूर्णाहार कभी नहीं मिलेगा?’ वायुदेव ने व्याकुल होकर प्रश्न किया।
‘अवश्य मिलेगा, वायुदेव!’ ब्रह्मा ने सौम्य स्वर में कहा। ‘मैं आपको इसका उपाय बताता हूं। मैंने अभी कहा कि अग्निदेव की शक्ति सीमित है और आप जानते ही हैं कि सृष्टि में किसी भी कार्य की पूर्णता के लिए स्त्री शक्ति का सहयोग आवश्यक है। इसलिए हविष्य के पाचन-कार्य को संपन्न करने के लिए भी सहायक के तौर पर हमें स्त्री शक्ति चाहिए, जिसके सहयोग से हविष्य पूर्ण रूप से देवताओं तक पहुंचाया जा सके।’
‘और यह सहायक शक्ति कौन हैं?’ इंद्र ने पूछा।
‘मैं उस शक्ति का आह्वान करता हूं, फिर आप उन्हें स्वयं ही देख लीजिए।’ यह कहकर ब्रह्मा ध्यान में लीन हो गए। कुछ देर बाद, तेज से परिपूर्ण एक देवी उनके समक्ष प्रकट हुईं।
‘प्रभु, मेरे लिए क्या आज्ञा है?’ देवी ने ब्रह्मा से पूछा।
ब्रह्मा ने कहा, ‘हे देवी! देवताओं को यह कष्ट है कि यज्ञ में अर्पित किया गया हविष्य इन्हें पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, क्योंकि अग्निदेव उसे ठीक से पचा नहीं पाते। इसीलिए मैंने स्त्री-शक्ति के तौर पर आपका आह्वान किया है। आपको अग्निदेव का साथ देना है। भविष्य में सभी ऋत्विज, यज्ञ के समय हविष्य की आहुति देने के उपरांत अग्नि-कुंड में घृत अर्पित हुए आपके नाम का उच्चारण करेंगे। आपकी शक्ति के सहयोग से अग्निदेव को हविष्य पचाने में सहायता मिलेगी और फिर वह देवताओं को प्राप्त हो जाएगा।’
सभी देवता हर्षित होकर ब्रह्मा से बोले, ‘हम आपके आभारी हैं। परंतु परमपिता, आपने देवी का नाम नहीं बताया। आहुति के समय इनके कौन-से नाम का उच्चारण किया जाएगा?’
‘स्वाहा! प्रत्येक आहुति के अंत में ‘स्वाहा’ बोलने से यज्ञ में अर्पित हविष्य, देवताओं को प्राप्त हो जाएगा और आप लोग पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाएंगे।’ ब्रह्मा ने उत्तर दिया।
देवता ब्रह्मा को प्रणाम कर प्रसन्न हृदय से देवलोक लौट आए।
तभी से यज्ञ में हविष्य की आहुति देने के बाद ‘स्वाहा’ उच्चारण किया जाता है। स्वाहा के उच्चारण के बिना आहुति पूर्ण नहीं होती।