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दिल क्यों होने लगा इतना बेचारा

संजय वर्मा
Updated Thu, 20 Aug 2020 03:14 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Ravi Batra
दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा का एक आधार यह भी है कि यह सबसे ज्यादा काले बालों वाले लोगों का मुल्क है। इशारा देश की युवा आबादी की तरफ है। इस युवा मानव संसाधन और ऊर्जा को बाजार ही नहीं, तमाम अन्य सार्थक वजहों से बेमिसाल पूंजी मानना गलत नहीं है। लेकिन हमारा यह युवा देश एक बड़ी मुश्किल में भी फंस गया है।


विकास का इंजन बनने वाले युवाओं पर हृदय रोगों का एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। महामारी कोविड-19 के मौजूदा दौर में दिल की बीमारियों का उल्लेख इसलिए भी जरूरी है, कि हृदय रोग कोरोना की चपेट में आए कई मरीजों की मौत की वजह भी बन रहे हैं।


हृदय रोगों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अक्सर हमारा दिमाग इस मामले में दिल का साथ नहीं देता है। ज्यादातर मानते नहीं हैं कि उन्हें हार्ट अटैक आ सकता है। दिल की बीमारियों का सही अंदाजा लगने में हुई इस चूक का जब तक एहसास होता है, काफी देर हो चुकी होती है।


बीते दिनों कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी के असमय निधन से यही समस्या फिर सामने आई है। ऐसे अनुमान हैं कि बीते 15 वर्षों में ही भारत में दिल की बीमारियां सौ फीसदी बढ़कर दोगुनी हो गई हैं। इस बारे में एक व्यवस्थित आकलन तीन साल पहले इंटरनैशनल कॉनजेस्टिव हार्ट फेल्योर ने किया था।


वैश्विक स्वास्थ्य जर्नल- द लैंसेट में प्रकाशित अध्ययन की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि हृदय रोगों से होने वाली मौतों में भारत का ग्राफ काफी ऊपर है। इस आकलन के मुताबिक, हृदय रोग की पहचान होने के एक साल के अंदर भारत में होने वाली मौतों का प्रतिशत 23 है। भारत की स्थिति इस मामले में चिंताजनक इसलिए है कि यह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की 15 फीसदी की दर से आठ प्रतिशत ज्यादा है।


वहीं अगर दक्षिण अमेरिका (9 फीसदी), पश्चिमी एशिया (9 फीसदी) और चीन (7 फीसदी) से तुलना करें, तो हालात भयावह प्रतीत होते हैं। आंकड़े कुछ और भी कहते हैं। जैसे- हमारे देश में एक-तिहाई मरीजों की मौत अस्पताल में दाखिल होने के दौरान हो रही है और एक-चौथाई मरीजों की बीमारी की पहचान के तीन महीने के अंदर।


दुनिया में करीब 26-28 करोड़ हृदय रोगियों की अनुमानित मौजूदा संख्या में फिलहाल 5.4 प्रतिशत भारत में बताए जाते हैं। देश की खराब स्वास्थ्य सेवाओं और प्राइवेट अस्पतालों के नाम पर कायम लूट तंत्र से जुड़ी ढेरों शिकायतों और आरोपों का झूठ-सच सरकारों से लेकर जनता भी बहुत कुछ जानती है।
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इलाज की महंगाई को लेकर आम जन की विवशता समझी जा सकती है, क्योंकि इस मामले में उसकी सुनवाई का कोई तंत्र काम करता नजर नहीं आ रहा है। बेशक, हृदय रोग की कुछ आनुवांशिक वजहें भी हैं। उन पर इंसान का वश नहीं चलता।


लेकिन कामकाज के तनाव, शारीरिक श्रम से दूर आलसी-सुस्त करने वाली जीवन-शैली और शरीर पर फालतू चर्बी जमाने वाला खानपान अगर काबू में नहीं है, तो दिल को बेचारा बनाने में किसी बाहरी वजह का योगदान उतना नहीं रह जाता है।


हार्ट फेल होने के कारणों के लिए डायबीटीज, हाई बीपी, अनिद्रा, किडनी की बीमारी और थायरॉयड की समस्या जिम्मेदार हैं। पर इनके पीछे तला-भुना, मसालेदार भोजन, जंकफूड, ज्यादा मात्रा में तेल, घी, मक्खन का सेवन और उस पर कसरतविहीन निष्क्रिय जीवन-शैली कम जिम्मेदार नहीं है।


अब तो गांव-कस्बों में खेती-किसानी में भी मशीनें हावी हैं और वहां भी टीवी, स्मार्टफोन ने लोगों की शारीरिक मेहनत छीन ली है। दवाओं, एंजियोप्लास्टी या बाईपास सर्जरी जैसे तरीकों से दिल के मरीजों को पक्के इलाज का आश्वासन देने वाला चिकित्सा तंत्र यह कभी नहीं बताता कि अगर दिनचर्या में खानपान के कुछ परहेज बरत लिए जाएं और योगासान-व्यायाम का एक रूटीन बना लिया जाए, तो शायद हार्ट फेल होने जैसी नौबत न पैदा हो।


हालांकि ये सलाहें हमारे आम जीवन में बहुत आम हैं और टीवी-इंटरनेट के जरिये इन तक पहुंच कहीं से भी मुश्किल नहीं है। बहुत संभव है कि अगर जिंदगी जीने के ढर्रे को जरा बदल लिया जाए, दिनचर्या में थोड़ी-मोड़ी सक्रियता शामिल कर ली जाए, तो दिल की बेचारगियां कम हो सकती हैं।
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