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असिहष्णु समाज में हम

Thu, 17 Dec 2015 01:21 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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जो लोग दूसरों के विचार, आदर्श विश्वास और व्यवहार मानने में दिलचस्पी नहीं दिखाते, हम उन्हें ही असहिष्णु कहते हैं। पिछले कुछ समय से भारत में यह बहस चल रही है कि क्या यहां असहिष्णुता बढ़ रही है। असहिष्णुता पर बहस के बावजूद समाज में असहिष्णुता कमोबेश बरकरार है। जैसे-अब भी नारी के प्रति पुरुष असहिष्णु हैं। गरीब के प्रति धनी असहिष्णु हैं। एक धर्म के प्रति दूसरे धर्म का आदमी असहिष्णु है।
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एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति दूसरी राजनीतिक विचारधारा असहिष्णु है। मनुष्य मूलतः असहिष्णु है। वह प्रेम करना जानता है, तो घृणा करना भी उसे आता है। असहिष्णुता पर हो रही बहस से कोई मुश्किल नहीं है। ऐसी स्वस्थ बहस स्वस्थ लोकतंत्र के प्रतीक हैं। पर ऐसी असहिष्णुता के साथ जो हिंसा जुड़ती है, वह चिंतनीय है।

सिर्फ खून-खराब करना ही असहिष्णुता नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना भी असहिष्णुता है। पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने माना कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध लगाना गलत था। पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने मेरी किताब पर प्रतिबंध लगाया था। वहां की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुझे राज्य से निष्कासित कर दिया, कोलकाता पुस्तक मेले में मेरी किताब के लोकार्पण को प्रतिबंधित किया, टेलीविजन पर मेरा मेगा सीरियल प्रसारित नहीं होने दिया। क्या यह असहिष्णुता नहीं है? कुछ लोगों का कहना है कि सलमान रुश्दी की किताब पर जब प्रतिबंध लगा था, जब उन्हें कोलकाता या जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भाग नहीं लेने दिया गया, या तस्लीमा नसरीन पर जब हैदराबाद में हमला किया गया, उन्हें जब कोलकाता और भारत से बाहर कर दिया गया, तब असहिष्णुता का विरोध करने वाले ये लेखक कहां थे? हालांकि यह वही तर्क है, जो केंद्र की मौजूदा सरकार या उसके समर्थक दे रहे हैं।
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लेकिन इस सच से इन्कार नहीं कर सकते कि भारत में हिंदू कट्टरवाद का जितना विरोध होता है, उतना मुस्लिम कट्टरवाद का विरोध नहीं होता। सभी समाज में असहिष्णु लोग रहते हैं। अमेरिका-यूरोप में भी असहिष्णु लोग हैं, एशिया-अफ्रीका में भी। भारत में असहिष्णुता इसी सरकार के दौर में दिख रही हो, ऐसा भी नहीं है। बल्कि गहराई में जाकर देखें, तो देश और मनुष्य धीरे-धीरे पहले की तुलना में अधिक सभ्य हो रहे हैं। अभी कहीं बलात्कार होता है, हत्या होती है, असहिष्णुता की कोई घटना होती है, तो हमें जल्दी ही पता चल जाता है।

आज न तो पहले की तरह सांप्रदायिक दंगे होते हैं, न ही मृतकों का आंकड़ा पहले जितना होता है। आज के लोग जानते हैं कि लड़कियों से बदसुलूकी करना गैरकानूनी है। कन्या भ्रूणहत्या की घटनाओं की लोग आज निंदा करते हैं। समाज में एक समय सवर्णों का अत्याचार काफी होता था, अब इन पर काफी हद तक अंकुश लगा है। कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है। कुल मिलाकर, आज का भारत मानवाधिकार, महिला अधिकार, समता और समानाधिकार में यकीन करता है। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं आया है। यह दशकों के संघर्ष का परिणाम है।

इसके बावजूद भारत समेत पूरी दुनिया में एक लड़ाई चल रही है। यह विभिन्न धर्मों के बीच की लड़ाई नहीं, बल्कि दो मतवादों की लड़ाई है। यह संघर्ष धर्मनिरपेक्षता और कट्टरवाद के बीच, वैज्ञानिक चेतना और धर्मांधता के बीच, तर्कवाद और अंधविश्वास के बीच, ज्ञान और अज्ञान के बीच, स्वतंत्रता और गुलामी के बीच है।

भारत में भी कट्टरवादी हिंदुओं में यह चिंता घर कर रही है कि हिंदू धर्म और संस्कृति कहीं खत्म न हो जाए। उनकी आशंका यह भी है कि मुस्लिम कट्टरवाद या इस्लाम ही हिंदू धर्म की विलुप्ति का कारण होगा। इसलिए धर्म को बचाए रखने के लिए हिंदू कट्टरवादी भी उसी रास्ते पर चलने का संकेत दे रहे हैं, जिस रास्ते पर मुस्लिम कट्टरवादी पहले ही चल पड़े हैं। भारत में तर्कवादियों को निशाना बनाने की यही वजह है।

लेकिन धर्म क्या इस तरह टिका रह पाएगा? एक समय पृथ्वी पर सैकड़ों धर्म थे। उनमें से अधिकतर विलुप्त हो चुके हैं। अलिमापिया पहाड़ पर स्थित वे सर्वशक्तिमान यूनानी देवतागण आज कहां हैं? रोमनों के नामी-गिरामी ईश्वरों का आज नाम-ओ-निशान नहीं है। मिस्र में फराओ लोगों के ईश्वर कहां हैं? सब आज इतिहास बन चुका है। यह कौन कह सकता है कि इस्लाम, ईसाई, यहूदी, बौद्ध और हिंदू धर्म भी एक समय इतिहास नहीं बन जाएगा?

ऐसा भी नहीं है कि लोग व्यक्तिगत स्तर पर असहिष्णु होते हैं। राजनेता भी कम असहिष्णु नहीं होते। पी चिदंरबरम ने सलमान रुश्दी की किताब पर लगे प्रतिबंध की गलती मान ली है। लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं ने चिदंबरम को काटते हुए किताब पर लगे प्रतिबंध को जिस तरह जायज ठहराया, उसे क्या कहेंगे? चिदंबरम की तरह पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी क्या अपनी गलती स्वीकारी है? नहीं, वे अपनी गलती कतई नहीं मानेंगे। ये गलतियां ही तो आज के राजनेताओं के लिए वास्तविकता है, जिसके बगैर चुनाव जीतना उनके लिए संभव नहीं।

जिस तरह यह देश चल रहा है, उसी तरह चलेगा। इसी तरह यह पृथ्वी चलेगी। शिक्षा और सजगता के साथ-साथ मूर्खता, अशिक्षा, जड़ता और भी चलेगी। धर्मांध लोग और राजनेता अपना स्वार्थ देखेंगे, और समाज को अंधकार में रखेंगे। केवल कुछ स्वस्थ, सजग मनुष्य ही इस समाज को बदलने के लिए आगे आएंगे। कुछ मुट्ठी भर लोग ही समाज को बदलते हैं। हमेशा ऐसा ही होता आया है।

मनुष्य मूलतः असहिष्णु है। वह प्रेम करना जानता है, तो घृणा करना भी उसे आता है। केवल कुछ स्वस्थ, सजग मनुष्य ही इस समाज को बदलने के लिए आगे आएंगे। कुछ मुट्ठी भर लोग ही समाज को बदलते हैं।
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